सोनिया गांधी

लोकसभा चुनाव 2019: कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष की सेहत पर रायबरेली में कोई असर नहीं

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रायबरेली।   कांग्रेस का गढ़  समझी जाने वाली रायबरेली  में इस बार कांटा मुकाबले का है  लेकिन  इससे कांग्रेस प्रत्याशी सोनिया  गांधी  की सेहत पर कोई खास असर पड़ता नजर नहीं आ रहा है। भले ही भाजपा के बड़े नेता रायबरेली में  भी कमल खिलाने के दावे करें  लेकिन सच तो यह है कि दिनेश सिंह को वहां  अपना प्रत्याशी बनाकर उन्होंने एक तरह से सोनिया गांधी को वॉकओवर दे दिया है।  दिनेश सिंह गांधी-नेहरू परिवार के बहुत नजदीक रहे हैं। पार्टी में कतिपय मतभेदों की वजह से वे भले ही वे भाजपा के अंग बन गए हों लेकिन  रायबरेली की जनता उन्हें उसी रूप में देखती है। रायबरेली के लोगों का गांधी परिवार से लगाव किसी से छिपा नहीं है। यही वजह है कि कांग्रेस के इस गढ़ में सेंध लगाना  किसी भी दल के लिए  बेहद मुश्किल होता है।

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सपा-बसपा गठबंधन ने  तो पहले ही कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी को वॉकओवर दे रखा है।  पहले बसपा वहां से अपने प्रत्याशी उतारा भी करती थी लेकिन इस बार उसने सपा के नक्शेकदम पर चलने में ही अपनी भलाई समझी है।  वैसे तमाम विरोध के बबाद भी सभी बड़े दल  दूसरे दल के बड़े नेताओं के विरोध से बचते हैं और उनके राजनीतिक हितों का ख्याल रखते हैं।  भाजपा को अगर वाकई सोनिया गांधी को घेरना होता तो वह दिनेश सिंह की बजाय किसी बड़े नेता को सोनिया गांधी के खिलाफ खड़ा करती।  कर्नाटक के बेल्लारी में जिस तरह भाजपा सोनिया गांधी के मुकाबले  सुषमा स्वराज को प्रत्याशी बनाया था, उस तरह की घेराबंदी भाजपा इस बार रायबरेली में भी कर सकती थी लेकिन उसने कांग्रेस के बड़े कद की नेता  सोनिया गांधी के सापेक्ष अगर  दिनेश सिंह जैसे  विधान पार्षद को उतारा है तो इसका मतलब सहज ही समझा जा सकता है।

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रायबरेली में कांग्रेस के अपने परंपरागत मत तो हैं ही, मायावती और अखिलेश को मिलने वाले  दलित ,यादव  और मुस्लिम मतों का रुझान कांग्रेस की ओर हो सकता है। जिले में 2011 की जनगणना पर गौर करें तो सर्वाधिक लगभग 3  लाख यादव मतदाता हैं और दो लाख ब्राह्मण मतदाता हैं।  मुस्लिम वोटर 2.5 लाख, मौर्या 2 लाख, क्षत्रिय 1 लाख 40 हजार,लोध 1.23 लाख, कुर्मी 80 हजार , कास्थ डेढ़ लाख और एक लाख पासी मतदाता हैं।  उनकी तादाद भी तीन लाख के आस-पास हैं।  दलितों की तादाद भी ठीक ठाक ही है।  अगर बसपा और सपा के वोट  जिनके भाजपा की ओर जाने के आसार बहुत कम हैं, कांग्रेस की ओर रुख करते हैं तो भाजपा प्रत्याशी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।  हालांकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, केंद्रीय स्वास्थ्यमंत्री  जेपी नड्डा  जातीय समीकरणों को साधने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। अपनी मां सोनिया गांधी के इस गढ़को बचाने के लिए  प्रियंका रायबरेली में ही डेरा डाले हुए हैं।  कांग्रेस की कोशिश समाज के सभी वर्गों को साधने की है और इसमें वह बहुत हद तक सफल होती भी नजर आ रही है।

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