क्यों सजते हैं क्रिसमस ट्री,जानें पेड़ों को सजाने का सैकड़ों साल पुराना इतिहास

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क्रिसमस डे पर सभी जगह क्रिसमस ट्री को सजाने का रिवाज़ है,लेकिन इसको सजाने के पीछे का इतिहास आज हम आपको बातएंगे।क्रिसमस डे के सेलिब्रेशन पर पेड़ों को सजाने का इतिहास सैकड़ों साल से ज्यादा पुराना है। क्रिसमस ट्री का ईसाइयों के सेलिब्रेशन से खास जुड़ाव है। जिसे प्रभु की ओर से लंबे जीवन का दिया जाने वाले आशीर्वाद के रूप में माना जाता है। प्राचीन काल में क्रिसमस ट्री को जीवन की निरंतरता का प्रतीक माना जाता था। मान्यता थी कि इसे सजाने से घर के बच्चों की आयु लम्बी होती है। इसी कारण क्रिसमस डे पर क्रिसमस ट्री को सजाया जाने लगा। कहते हैं, हजारों साल पहले उत्तरी यूरोप में इसकी शुरुआत हुई थी, जब क्रिसमस के मौके फर ट्री (सनोबर) को सजाया गया। इसे चेन की मदद से घर के बाहर लटकाया जाता था। ऐसे लोग जो पेड़ को खरीद पाने में अमसर्थ थे वे लकड़ी को पिरामिड आकार देकर सजाते थे।

साथ ही क्रिसमस ट्री को क्रिसमस पर सजाने की परम्परा जर्मनी से प्रारम्भ हुई। 19वीं सदी से यह परम्परा इंग्लैंड में पहुंची, जहां से सम्पूर्ण विश्व में यह प्रचलन में आ गई। क्रिसमस ट्री को डेकोरेट करने के साथ इसमें खाने की चीजें रखने का रिवाज सबसे पहले जर्मनी में ही शुरु हुआ जब इसमें सोने के वर्क में लिपटे सेब, जिंजरब्रेड से सजाया गया।

इतना ही नहीं मान्यता ये भी है कि क्रिसमस ट्री का सम्बंध प्रभु यीशु मसीह के जन्म से है। जब उनका जन्म हुआ तब उनके माता पिता मरियम एवं जोसेफ को बधाई देने वालों देवदूत भी शामिल थे। जिन्होंने सितारों से रोशन सदाबहार फर को उन्हें भेंट किया। तब से ही सदाबहार क्रिसमस फर के पेड़ को क्रिसमस ट्री के रूप में मान्यता मिली।

इस त्यौहार की तैयारी कई दिनों से शुरू हो जाती है, फेस्टिवल से पहले ईसाई धर्म के लोग लकड़ी से क्रिसमस ट्री तैयार करते हैं और फिर इसे डेकोरेट करते हैं। इसमें ज्यादातर मोमबत्तियां और टॉफियां, घंटी और अलग-अलग रंगों के रिबन का इस्तेमाल किया जाता है। क्रिसमस ट्री पर छोटी-छोटी मोमबत्तियां लगाने का प्रचलन 17वीं शताब्दी से शुरू हो गया था। माना जाता है कि इसे घर में रखने से बुरी आत्माएं दूर होती हैं तथा सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है।

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