भगत सिंह के चुनिंदा शेर

भगत सिंह के चुनिंदा शेर, मैं इश्क भी लिखना चाहूं तो इंकलाब लिख जाता है…

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नई दिल्ली। देश के लिए मर मिटने वाले देशभक्तों में शहीद-ए-आजम भगत सिंह का योगदान नहीं भुलाया जा सकता है। देश के प्रति उनका प्रेम, दीवानगी और मर मिटने का भाव, उनके शेर-ओ-शायरी और कविताओं में साफ दिखाई देता है, जो आज भी युवाओं में आज भी जोश भरने का काम करता है।

शहीद दिवस विशेष: ‘जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता

पढ़ें भगत सिंह के वतन पर लिखे कुछ चुनिंदा शेर –

 

मेरी कलम भी वाकिफ है मेरे जज्बातों से,
मैं इश्क भी ​लिखना चाहूं तो इंकलाब लिख जाता है।

सीनें में जुनूं, आंखों में देशभक्ति की चमक रखता हूं
दुश्मन की सांसें थम जाए, आवाज में वो धमक रखता हूं

लिख रहा हूं मैं अंजाम, जिसका कल आगाज आएगा
मेरे लहू का हर एक कतरा, इंकलाब लाएगा
मैं रहूं या न रहूं पर, ये वादा है मेरा तुझसे
मेरे बाद वतन पर मरने वालों का सैलाब आएगा

मुझे तन चाहिए, न धन चाहिए
बस अमन से भरा यह वतन चाहिए
जब तक जिंदा रहूं, इस मातृ-भूमि के लिए
और जब मरूं तो तिरंगा ही कफन चाहिए

कभी वतन के लिए सोच के देख लेना,
कभी मां के चरण चूम के देख लेना,
कितना मजा आता है मरने में यारों,
कभी मुल्क के लिए मर के देख लेना,

हम अपने खून से लिक्खें कहानी ऐ वतन मेरे
करें कुर्बान हंस कर ये जवानी ऐ वतन मेरे

मैं भारतवर्ष का हरदम अमिट सम्मान करता हूं
यहां की चांदनी, मिट्टी का ही गुणगान करता हूं
मुझे चिंता नहीं है स्वर्ग जाकर मोक्ष पाने की
तिरंगा हो कफन मेरा, बस यही अरमान रखता हूं

जमाने भर में मिलते हैं आशिक कई,
मगर वतन से खूबसूरत कोई सनम नहीं होता,
नोटों में भी लिपट कर,
सोने में सिमटकर मरे हैं शासक कई,
मगर तिरंगे से खूबसूरत कोई कफन नहीं होता

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