अजेय होता ‘हिन्दी से न्याय ‘ देशव्यापी-अभियान

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लखनऊ। मद्रास हाईकोर्ट (Madras Highcourt) में एक इतिहास रचा गया, अदालत में हिन्दी (Hindi) भाषियों के हक की लड़ाई लड़ी जा रही थी, बहस कर रही थीं, कभी पूर्व राष्ट्रपति कलाम को हिन्दी सिखाने वाली प्रतिभा मलिक, मद्रास हाईकोर्ट का कक्ष-संख्या-दो एक इतिहास के रचने का चश्मदीद बन गया, जजों ने न सिर्फ हिन्दी में पूरी बहस सुनी बल्कि फैसला भी हिन्दीभाषियों के पक्ष में सुनाया, देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम ने भी हिन्दी में सुने गये मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को बरक़रार रखा है।

गृह मंत्रालय के अधीन राजभाषा विभाग में केन्द्रीय हिंदी प्रशिक्षण संस्थान और हिंदी शिक्षण योजना में काम करने वाले हिंदी प्राध्यापक पूरे देश में हिंदी न जानने वाले केंद्रीय सरकार के सचिव स्तर के अधिकारियों से लेकर क्लर्क तक के कर्मचारियों को हिंदी सिखाते हैं।

हिंदी प्राध्यापक जो कोर्स पढ़ाते हैं, उनका स्तर लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी में हिंदी न जानने वाले आई ए एस प्रशिक्षुओं को पढ़ाई जाने वाली हिंदी के पाठ्यक्रम से उच्च स्तर का है।

हिंदी प्राध्यापक के पद के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता एम ए हिंदी और बी एड है तथा बी ए में अंग्रेजी विषय होना भी अनिवार्य है। जब 2002 में मद्रास कैट में मुकदमा किया गया था तब हिंदी प्राध्यापकों को 6500-10500 के ग्रेड में रखा गया था।

अजेय होता ‘हिन्दी से न्याय’ अभियान

हिंदी शिक्षण योजना में ही जो लोग हिंदी जानने वाले क्लर्कों को हिंदी टाइपिंग और शार्ट हैंड सिखाते हैं, उनकी शैक्षिक योग्यता हिंदी टाइपिंग शार्ट हैंड सीखे होने के सर्टिफिकेट के साथ 12वीं पास थी तथा उन्हें असिस्टेंट डायरेक्टर (हिंदी टाइपिंग शार्ट हैंड) का पदनाम और 7500-12000 के ग्रेड में रखा गया था।

-केरल में जन्मी मलयालम-भाषी प्रतिभा मलिक ने की पहल

-पति अजय मलिक ने लड़ी है दिल्ली में  मातृभाषा की लम्बी  लड़ाई।

-हिन्दी से न्याय इस देशव्यापी अभियान के अधिष्ठाता-मंडल में हैं सम्मिलित

-गैर हिन्दीभाषी प्रान्त में हिन्दी में लड़ी हिन्दीभाषियों की लड़ाई

-ए.पी.जे.अब्दुल कलाम को हिन्दी सिखायी थी प्रतिभा मलिक ने।

-हिन्दी में सुनी बहस के निर्णय को यथावत रखा सुप्रीमकोर्ट ने

 

हिंदी प्राध्यापकों की शैक्षिक योग्यता और जिम्मेदारी को देखते हुए 1952 से 1974-75 तक कालेज और यूनिवर्सिटी के लेक्चरार से भी ज्यादा वेतन दिया जाता था। हिंदी प्राध्यापकों की मांग थी कि उन्हें असिस्टेंट डायरेक्टर (हिंदी टाइपिंग शार्ट हैंड) से ज्यादा और कालेज लेक्चरार के बराबर वेतन दिया जाना चाहिए।

‘हिन्दी से न्याय’ को देशव्यापी अभियान हेतु राष्ट्रीय सहमति बनाने का प्रयत्न

 

वर्ष 2002 में कैट के पहले आदेश पर सचिव राजभाषा विभाग ने सुनवाई की और हिंदी प्राध्यापकों के साथ अन्याय की बात स्वीकार की तथा छठे वेतन आयोग के समय न्याय दिलाने का आश्वासन दिया। किन्तु कैट ने अपने दूसरे आदेश में छठे वेतन आयोग तक इंतजार करने के आश्वासन को हिंदी प्राध्यापकों के साथ घोर अन्याय की संज्ञा दी।

अजेय होता ‘हिन्दी से न्याय’ अभियान

तीसरी बार सरकार ने कैट में शपथ पत्र के साथ आश्वासन दिया कि छठे वेतन आयोग के समय हिंदी प्राध्यापकों को पक्का न्याय दिया जाएगा। छठे-सातवें किसी भी वेतन आयोग के सामने सरकार ने अपने आश्वासन को पूरा नहीं किया। सरकार ने आई आई पी ए, नई दिल्ली की एक रिव्यू कमेटी गठित की, जिसने अपनी रिपोर्ट में हिंदी प्राध्यापकों को लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी के लेक्चरार, रीडर, प्रोफेसर के समान वेतन देने की सिफारिश की, जिसे राजभाषा विभाग के अधिकारियों ने अनदेखा करते हुए दबा दिया। हिंदी प्राध्यापक मद्रास हाई कोर्ट गए और प्रतिभा मलिक ने माननीय जस्टिस पी के मिश्रा की पीठ (कोर्ट नंबर-2 ) में स्वयं बहस की। मद्रास हाई कोर्ट के इतिहास में पीठ के आदेश पर पहली बार हिंदी में बहस हुई। वादी और माननीय पीठ के जज सभी हिंदीतर भाषी थे। मद्रास हाईकोर्ट ने अपने 09/04/2009 के आदेश में हिंदी प्राध्यापकों के साथ किए जा रहे अन्याय को न्यायिक विवेक को झकझोर देने वाला बताया तथा हिंदी प्राध्यापकों को असिस्टेंट डायरेक्टर के समान पदनाम तथा वेतनमान देने का आदेश दिया। उसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने चुनौती दी हुई थी ।

चन्द्रशेखर उपाध्याय ने दी बधाई

प्रतिभा मलिक अविचल-अडिग हिन्दी योद्धा हैं, उन्होंने गैर-हिन्दी-भाषी प्रान्त में हिन्दी की विजय-पताका फहरायी हैं, उत्तराखण्ड के पश्चात मद्रास हाईकोर्ट की सीढ़ियों पर हिन्दी की  पदचाप सुनायी दी है  देश-भर के’हिन्दी से न्याय ‘ अभियान के समस्त योद्धाओं को अनन्त-शुभकामनाएं एवम् बधाई ।इससे हमारा हौसला बढ़ा है, हम हिन्दी व समस्त भारतीय भाषा संसार को विश्वास दिलाते हैं कि पूरी उर्जा व शक्ति के साथ ‘विजय-पथ की ओर बढ़ेंगे एवम् विजय प्राप्त करेंगे । सादर-वन्देमातरम् ।

Chandrashekhar Upadhyay
Chandrashekhar Upadhyay

चन्द्रशेखर पण्डित भुवनेश्वर दयाल उपाध्याय, न्यायविद् । हिन्दी माध्यम से एल-एल . एम. उत्तीर्ण करने वाले प्रथम भारतीय छात्र।

नेतृत्व-पुरुष ‘हिन्दी से न्याय ‘ देशव्यापी-अभियान ।  न्यायिक क्षेत्र के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘न्याय-मित्र ‘ न्याय-मित्र’ से पुरस्कृत न्यायाधीश ।

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