अमेरिका औए ईरान

अमेरिका और ईरान की जंग में पिसता भारत

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सियाराम पांडेय ‘शांत

अमेरिका और ईरान के बीच दुश्मनी का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर निकल आया है। हाल की घटना तो कुछ ऐसा ही बयां करती है। ईरानी सेनापति कासिम सुलेमानी की हत्या और इसके बाद ईरान द्वारा अमेरिका दूतावास और एयरबेस पर किए गए राकेट हमलों ने दुनिया भर की बेचैनी बढ़ा दी है।

जिस तरह जामकरन मस्जिद पर लाल झंडा फहराकर ईरान ने इंतकाम का एलान किया है, उसे बहुत हल्के में नहीं देखा जा सकता। अमेरिका और ईरान की इस जंग में पिस रहा है भारत। दोनों ही उसके मित्र देश हैं। दोनों ही से उसके व्यापारिक संबंध हैं। वह किसी की भी तरफदारी नहीं कर सकता। ऐसा उसे करना भी नहीं चाहिए लेकिन भारतीय मुसलमान जिस तरह से अमेरिका के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। ईरान के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं। भारत उनकी आवाज की अनदेखी भी तो नहीं कर सकता।

भारत के लाखों लोग जिसमें मुस्लिम ही नहीं, हिंदू भी शामिल हैं, खाड़ी के देशों में काम करते हैं। अगर युद्ध होता है तो अपने नागरिकों की सुरक्षित स्वदेश वापसी  भारत  के लिए बड़ी चुनौती होगी। अभी तो क्रिया—प्रतिक्रिया भर है और भारत आने वाले कच्चे तेल की कीमतें बढ़ गई हैं। युद्ध के दौरान क्रूड आयल की कीमतें आसमान छुएंगी, ऐसे में भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रभावित होना लगभग तय है। भारत अगर इस प्रकरण में तटस्थ होने की रणनीति अख्तियार करता है तो विपक्ष उस पर दबाव बनाएगा।

जैसा कि वह ननकाना साहब गुरुद्वारे पर हमले के संदर्भ में कर रहा है। नागरिकता संशोधन कानून, एनआरसी और एनपीआर का मुखर विरोध करने वाली कांग्रेस मोदी सरकार पर दबाव बना रही है कि वह पाकिस्तान पर इस हमले के लिए दबाव बनाए। अन्य विपक्षी दल भी कुछ इसी तरह की मांग कर रहे हैं। सिख समाज की ओर से भी इसी तरह की मांग उठ रही है। यह और बात है कि ननकाना साहब पर हमले से पाकिस्तान की इमरान सरकार मुकर रही है लेकिन तस्वीरें गवाह हैं कि वहां हुआ क्या है?

भारत की मजबूरी है कि जब उसके अपने नागरिकों के हितों की बात आएगी तो उसे अपने नागरिकों के हितों की रक्षा करनी होगी। वैसे अमेरिकी हमले में सुलेमानी  की हत्या  के खिलाफ जिस तरह ईरान ने संयुक्त राष्ट्र से शिकायत की है और अमेरिका जिस तरह इजराइल और लेबनान के राष्ट्र प्रमुखों से बात कर रहा है, उसे बहुत हल्के में नहीं लिया जा सकता।

ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, चीन, रूस और यूरोपियन यूनियन भी अमेरिकी कार्रवाई के पक्ष में नहीं है लेकिन जिस तरह अमेरिका और ईरान के राष्ट्रपति बयान दे रहे हैं, उससे तो नहीं लगता कि दोनों देश किसी समझौते की दिशा में बढ़ रहे हैं। दोनों तरह है आग बराबर लगी हुई। यह आग बदले की है। कुचल देने की है। एक दूसरे को नेस्तनाबूंद कर देने की है।

गाजियाबाद में एक ट्रॉली में टक्कर लगने से हुई पांच लोगों की मौत, दो घायल 

अगर दोनों देशों के बीच युद्ध होता है तो चीन, रूस और भारत पर तेल की बढ़ती कीमतों और अनुपलब्धता का दबाव बनेगा। उन पर महंगाई की बेतहासा मार पड़ेगी। जिस तरह सद्दाम हुसैन को कुचलने की जिद में अमेरिका ने इराक के बहुत सारे तेल के कुएं नष्ट किए थे, अगर उस घटना की पुनरावृत्ति होती है, जैसा कि युद्ध और उत्तेजना के क्षणों में संभव भी है तो यह प्राकृतिक संसाधनों की बहुत बड़ी बर्बादी होगी।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कासिम सुलेमानी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। दिल्ली में हुई घटना को भी कासिम सुलेमानी का कारनामा बताया है लेकिन ईरान पर हमले की एक बड़ी वजह इसी साल होने वाला अमेरिकी चुनाव भी है। अमेरिकी चुनावों पर युद्ध का असर अक्सर पड़ता रहा है। पिछले चुनाव में ट्रंप ने खुद 29 नवंबर 2011 को इस बात की आशंका जाहिर की थी कि चुनाव जीतने के लिए ओबामा ईरान पर हमला कर सकते हैं।

ओबामा ने तो हमला नहीं किया लेकिन ट्रंप ने ईरान और अमेरिका के बीच माहौल तो गरमा ही दिया है। 2003 में जार्ज बुश ने इराक पर हमला किया था और अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव इसी बिना पर जीता था। ईरान और अमेरिका के बीच पैदा हुए तनाव को लेकर दुनिया दो हिस्सों में बंट गई लगती है। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। दोनों ओर परमाणु ताकत से लैस देशों की खेमेबंदी है। ऐसे में ज़रा सी चूक एक भयानक जंग को जन्म दे सकती है। दो सुपर पावर यानी अमेरिका और रूस अगर आमने-सामने आ जाते हैं तो इस स्थिति बहुत मुफीद नहीं होगी।

अमेरिका जहां ईरान को सबक सिखाने की धमकी दे रहा है, वहीं रूस ने साफ कर दिया है कि अगर अमेरिका ईरान पर हमला करेगा तो इसका अंजाम खौफनाक होगा क्योंकि वह चुप नहीं बैठेगा। ईरान और इराक के युद्ध के दौरान भी मस्जिद से लाल झंडा नहीं फहराया गया था लेकिन इस बार अगर ऐसा हुआ है तो इसके अपने बड़े निहितार्थ हैं। हालांकि अमेरिका और ईरान के मध्य विवाद 67 साल पुराना है।

1953 में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने ब्रिटेन के साथ मिलकर ईरान में तख्तापलट करवा दिया था। दरअसल निर्वाचित प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसाद्दिक तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण करना चाहते थे और यह बात अमेरिका के गले नहीं उतर रही थी। इसलिए उसने मोसाद्दिक को हटाकर सत्ता की कमान ईरान के शाह रजा पहलवी के हाथ में दे दी थी। 1979 की ईरानी क्रांति के बड़े नेता बनकर उभरे थे अयातुल्लाह खुमैनी। उनके निशाने पर शाह पहलवी और अमेरिका दोनों रहे।

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जनविरोध को देखते हुए शाह पहलवी को ईरान छोड़ने और अमेरिका में शरण लेने को विवश होना पड़ा। 1979-81 का दूतावास संकट भी ईरान और इराक की दुश्मनी की बड़ी वजह रही है। तेहरान में ईरानी छात्रों ने अमेरिकी दूतावास को अपने कब्जे में ले लिया था। 52 अमेरिकी नागरिकों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा गया था। 2012 में इराक ने अमेरिका की मदद से ईरान पर हमला कर दिया। युद्ध आठ साल चला।
2006 में ईरान ने अपने यहां पांच परमाणु रिएक्टर लगा लिए थे। विवाद के रैले पर यह नीम चढ़ने वाली बात हुई। उसने भी एक परमाणु रिएक्टर उसने रूस की मदद से लगाया था। इसे लेकर  इजरायल और अमेरिका की ईरान पर खिसियाहट स्वाभाविक भी थी। हालांकि ईरान बार-बार इस बात की सफाई देता रहा कि ये परमाणु बिजली घर ऊर्जा के लिए है न कि परमाणु हथियार बनाने के लिए लेकिन दोनों देशों के बीच तलखी हटने का नाम नहीं ले रही थी।

वर्ष 2015 में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के कार्यकाल में दोनों देशों  के बीच रिश्तों पर जमी बर्फ लगभग पिघल गई।  ईरान के साथ परमाणु समझौता हुआ, जिसमें ईरान ने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने की बात की। इसके बदले उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में थोड़ी ढील दी गई थी लेकिन ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के बाद न केवल इसे बाहियात बताया बल्कि 2018 में यह समझौता रद्द भी कर दिया और उभय देशों के बीच विवाद के घाव फिर हरे हो गए। 27 दिसंबर को एक राकेट हमले में अमेरिकी ठेकेदार की मौत के बाद यह मामला ज्यादा गंभीर हो गया था।  कुछ सप्ताह पहले सऊदी अरब के एक तेल-क्षेत्र पर भी जबर्दस्त हमला हुआ था। उसके लिए ईरान को गुनहगार ठहराया गया था।

भले ही ट्रंप अपने निर्णय को इन घटनाओं के आलोक में सही ठहराने की कोशिश करें लेकिन दुनिया को तीसरे विश्वयुद्ध की आग में झोंकने का पाप तो उन्हें लगेगा ही। जो देश अमेरिका या ईरान के साथ जाने की सोच रहे हैं, उन्हें सर्वप्रथम तो यह प्रयास करना चाहिए कि दोनों देशों के बीच शांत स्थापित हो। किसके निशाने पर कितने ठिकाने  हैं,इस पर गुमान करने से अच्छा होगा कि दोनों देश संयम से काम लें।

उत्तेजना में लिए गए उनके निर्णय कई देशों के लिए परेशानी का सबब बन सकते हैं। अपनी न सही, दूसरों की परेशानी को समझें। युद्ध वैसे भी अंतिम विकल्प होता है। जब तक, जितना ही इसे टाला जा सके, उतना ही बेहतर है। युद्धोन्माद से नुकसान ही होता है, फायदा कुछ नहीं होता। दोनों देशों के हुक्मरानों को यह बात समझनी चाहिए और ठंडे दिल से सोचकर ही कोई निर्णय लेना चाहिए।

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