अब हरियाणा की अदालत में हिंदी में काम

तीन दशक पुरानी मुहिम रंग ला रही, अब हरियाणा की अदालतों में भी होगा हिंदी में काम

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सियाराम पांडेय ‘शांत’

देश की सभी छोटी और बड़ी अदालतों में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में भी कामकाज को लेकर प्रख्यात न्यायविद चंद्रशेखर उपाध्याय पिछले तीन दशक से संघर्ष कर रहे हैं। उनकी यह मुहिम रंग ला रही है। उत्तराखंड के बाद अब हरियाणा सरकार ने भी अपनी जिला अदालतों में हिंदी में काम करने को मंजूरी दे दी है। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की अध्यक्षता में शुक्रवार को मंत्रिमंडल की बैठक में इस आशय का निर्णय लिया गया है। हरियाणा के 78 विध्यायकों, महाधिवक्ता और सैकड़ों अधिवक्ताओं ने इस बावत मुख्यमंत्री को मांगपत्र सौंपा था। इसे आधार बनाते हुए, हरियाणा मंत्रिमंडल ने उक्त आशय का निर्णय लिया है।

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने हिंदी भाषा के अधिकृत उपयोग के बारे में भी एक प्रस्ताव को स्वीकृत दी

गौरतलब है कि विधि आयोग के सदस्य चंद्रशेखर उपाध्याय लम्बे समय से हिंदी को गंगासागर बनाने की मुहिम के तहत देश भर में के मुख्यमंत्रियों, सांसदों, विधायकों और वकीलों से संपर्क कर रहे हैं। हरियाणा में भी हाल-फिलहाल उनके कई दौरे इस बाबत हुए हैं। समझा जा रहा है कि, अधिवक्ताओं और विधायकों के ज्ञापन देने के पीछे उनकी बड़ी भूमिका रही है। मंत्रिमंडल की बैठक में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने हिंदी भाषा के अधिकृत उपयोग के बारे में भी एक प्रस्ताव को स्वीकृत दी गयी है। हिंदी भाषी क्षेत्र होने नाते हरियाणा वर्ष 1966 में एक अलग राज्य बना था। वर्ष 1969 में हरियाणा राजभाषा अधिनियम के तहत हिंदी को हरियाणा राज्य की आधिकारिक भाषा बनाया गया था। अब जब मंत्रि मंडल ने न्यायालयों में हिंदी में काम करने का प्रस्ताव राज्यपाल को भेजने का फैसला किया है, तो इससे एक बड़ी उम्मीद बनी है।

श्री उपाध्याय का शुरू से ही यह मानना रहा है, कि देश के अधिकांश लोग अंग्रेजी नहीं समझ पाते, इसके बाद भी देश की प्रमुख अदालतों में अंग्रेजी में फैसले सुनाये जाते हैं। यह औचित्यहीन है और इसपर विचार किया जाना चाहिए। उनकी मांग है कि, देश की सभी अदालतों के आदेश हिंदी के साथ-साथ क्षेत्रीय भाषाओं में भी सुलभ होने चाहिए। उनका कहना है कि, अदालतों में अंग्रेजी में काम-काज की व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 348 की देन है। जिसे 1950 में संविधान लागू करते वक्त अनुच्छेद 370 की तरह अस्थाई तौर पर 348 भी लागू किया गया था। जिसे अनुच्छेद 349 के तहत 15 साल बाद अनिवार्य रूप से संशोधित किया जाना चाहिए था।

हिंदी में एलएलएम करने वाले देश के पहले विद्यार्थी चंद्रशेखर उपाध्याय उत्तराखंड के एडिशनल एड्वोकेट जनरल भी रहे

हिंदी में एलएलएम करने वाले देश के पहले विद्यार्थी चंद्रशेखर उपाध्याय उत्तराखंड के एडिशनल एड्वोकेट जनरल भी रहे हैं। अदालतों में अंग्रेजी आधारित काम-काज की व्यवस्था ख़त्म करने के लिए, वह अलग-अलग राज्यों में जाकर मुख्यमंत्रियों से मिल रहे हैं। गत सोमवार को इस क्रम में उन्होंने महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोशियारी से मुलाक़ात की और अनुच्छेद 163 (2) के अंतर्गत राज्यपाल को विधिक सुझाव दिया कि वे मुंबई उच्च न्यायालय को सुझाव पत्र दें कि, वहां उत्तराखंड की तरह ही हिंदी और मराठी भाषा में भी काम काज हो। इस दौरान उन्होंने बताया कि, हालही में अनुच्छेद 370 ख़त्म करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, कि संविधान में अब कुछ भी अस्थायी स्थायी नहीं रहेगा। प्रधानमंत्री के इस कथन से सहमति जाहिर करते हुए उन्होंने मांग की है, कि अनुच्छेद 370 की तरह अनुच्छेद 348 को भी संशोधित किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में राजभाषा हिंदी के साथ क्षेत्रीय भाषाओं में भी काम करने का मार्ग प्रशस्त किया जाए। उन्होंने कहा कि, यह काम सिर्फ संसद ही कर सकती है, इसलिए उन्होंने राज्यों की मदद लेने का प्रयास शुरू किया है।

गौरतलब है कि, चंद्रशेखर उपाध्याय ने उत्तराखंड के एडिशनल एड्वोकेट जनरल रहते हुए 12 अक्टूबर 2004 को अनिल चौधरी बनाम उत्तराखंड राज्य मामले में उत्तराखंड राज्य की और से उच्च न्यायालय इलाहाबाद में हिंदी में भारत का पहला प्रतिशपथ पत्र दाखिल किया था और उसे अदालत ने स्वीकार भी किया था। वर्ष 2010-11 में मुख्यमंत्री उत्तराखंड के ओएसडी, लीगल, लेजिस्लेटिव एंड पार्लियामेंट अफेयर्स रहते हुए श्री उपाध्याय ने अपने प्रयासों से एक गज़ट अधिसूचना जारी कराई जिसके अंतर्गत उच्च न्यायालय उत्तराखंड, नैनीताल में सम्पूर्ण वाद कार्रवाई हिंदी भाषा में संचालित किया जाना तय की गयी। सभी विधि अधिकारियों और अधिवक्ताओं को इस संदर्भ में उचित निर्देश भी पारित किये गए। जुलाई 2013 में इसी गज़ट नोटीफिकेशन के कारण हिंदी भाषा में पहली रिट याचिका (जाति प्रमाण पत्र संदर्भित) उत्तराखंड नैनीताल में स्वीकार की गयी और इस प्रकार हिंदी भाषा में उच्च न्यायालय में कार्रवाई करने वाला उत्तराखंड भारत का पहला राज्य बन गया।

लखनऊ में द्वितीय विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम श्रेणी) के पद से चंद्रशेखर उपाध्याय ने 23 जुलाई 2000 को एक दिन में मात्र 6 घंटे के भीतर 253 वाद तथा उसी वर्ष 22 अक्टूबर को एक दिन में मात्र 6 घंटे में 210 वाद का निस्तारण किया। मात्र 19 महीने में 3778 वादों का निस्तारण करने वाले देश के पहले और एक मात्र न्यायाधीश बने। यह सारे निर्णय उन्होंने हिंदी भाषा में पारित किये।

विकथ्य है की वर्ष 2012 में जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तो उन्होंने चंद्रशेखर उपाध्याय को आश्वस्त किया था कि केंद्र में भाजपा सरकार बनने पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 348 को संशोधित करवाएंगे लेकिन उनके दुसरे कार्यकाल के भी कई माह बीत चुके हैं और अभी तक इस विषय पर कुछ नहीं हुआ है। उन्होंने कहा, कि अदालतों में वकीलों के स्तर पर अंग्रेजी में की जाने वाली बहस, अंग्रेजी में दिए जाने वाले फैसले से प्रायः वादी और प्रतिवादी अनभिज्ञ रहते हैं। उन्हें उतना ही पता चल पाता है, जितना कि उनके वकील उन्हें बताते हैं। यह वादी और प्रतिवादी के साथ अन्याय है। इस सिलसिले पर अविलम्ब रोक लगनी चाहिए। हरियाणा मंत्रिमंडल के फैसले का स्वागत करते हुए उन्होंने अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों से भी आग्रह किया है कि वे इसी तरह का प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजें ताकि देश भर की अदालतों में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में भी काम काज शुरू करने की राह आसान हो सके।

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