रेडियो आकाशवाणी और विविध भारती में महिलाओं की अहम भूमिका

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वरिष्ठ पत्रकार वंदना दवे -सूचना और मनोरंजन के नित नए उभरते माध्यमों के बीच रेडियो की हैसियत अब भी बरक़रार है। ख़ास तौर से आकाशवाणी ( Radio Akashvani )  और विविध भारती तो हमारी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का हिस्सा हैं। इन दोनों को सजाने-संवारने में  रही है। मध्यप्रदेश के संदर्भ में इस विषय पर रोशनी डाल रही हूँ।

भारत की आज़ादी के वक्त संचार तरक्की में प्रिंटिंग मशीन व समाचार पत्रों के बाद रेडियो एक बहुत बड़ी क्रांति थी। ध्वनि तरंगों का इस्तेमाल कर संगीत, मनोरंजन, शैक्षिक और देश विदेश की जानकारी एक साथ  बहुत सारे लोगों तक पहुंच रही थी। भारत की आज़ादी हो या गांधी जी की हत्या लोगों को तत्काल इसकी जानकारी मिल रही थी। तत्समय देश की बहुतायत अशिक्षित और अवैज्ञानिक सोच के लोगों के लिए ये बहुत बड़ा अजूबा था। इसी के साथ रेडियो से प्रसारित आवाज में जब स्त्री स्वर भी मिल गया तो लोगों का आश्चर्य बढ़ जाना लाजिमी था। यह ऑल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस है। अब आप सईदा बानो से उर्दू में तफ्सील से समाचार सुनेंगे। यह आवाज  14 अगस्त 1947 सुबह आठ बजे रेडियो पर हजारों लोगों ने सुनी तो उन्हें यकीन करना मुश्किल हो गया कि किसी महिला की आवाज घर की चारदीवारी से निकल कर इतनी दूर पहुंच जाएगी। इससे पहले न बीबीसी और न ही भारतीय रेडियो में कोई महिला उद्घोषक रही थी। इसी के साथ वैश्विक स्तर पर भी नये भारत का संदेश पहुंच गया कि  भारत की आधी आबादी की आवाज भी मायने रखेगी। यहीं से महिलाओं की आकाशवाणी में भागीदारी का सिलसिला शुरू हुआ जो बदस्तूर जारी है।आज हर रेडियो स्टेशन पर महिला उद्घोषक से लगाकर तकनीकी कर्मी तक अपना कार्य बखूबी निभा रही है। सईदा बानो का बचपन भोपाल में ही बीता था। उनकी आत्मकथा डगर से हटकर में भोपाल में बिताए बचपन की बहुत सारी यादों का जिक्र किया है उन्होंने।

 

मप्र में सबसे पहले रेडियो स्टेशन की शुरुआत इन्दौर से 22 मई 1955 में हुई। ऑल इंडिया रेडियो के महानिदेशालय दिल्ली में पदस्थ मालवीमना डॉ श्याम परमार के प्रयासों से इन्दौर आकाशवाणी की स्थापना मालवा हाऊस में की गई। हालांकि आकाशवाणी नाम 1957 में मैसूर के विद्वान और चिंतक एम वी गोस्वामी ने पंचतंत्र की कहानियों से लेकर गढ़ा।

आकाशवाणी इन्दौर ने जल्द ही समूचे मालवा अंचल में अपनी गहरी पैठ बना ली थी। इसी के चलते रेडियो उद्घोषकों को फ़िल्मी सितारों जैसी लोकप्रियता मिलने लगी थी। लोगों को उनकी फरमाइश पर मनपसंद गाने झट से सुनने को मिल जाया करते थे। जो उनकी मनोरंजक उपलब्धि मानी जाती थी।

नरहरि पटेल के शब्दों में उस वक्त रेकार्डिंग मशीन इन्दौर नहीं पहुंची थी इसलिए नाटक भर्तहरी पिंगला लाईव मंचित हुआ। उनके साथ मराठी रंगमंच की प्रख्यात कलाकार सुमन धर्माधिकारी ने काम किया था। रणजीत बड़जात्या इन्दौर आकाशवाणी की स्थापना के साथ ही इससे जुड़ी थी। उनका भी कहना है कि उस वक्त रिकॉर्डिंग मशीन इन्दौर न आने से कोयल या पक्षियों की आवाज भी हमें लाईव प्रसारित करनी होती थी।

रणजीत जी आकाशवाणी की अपनी यात्रा के बारे में बताती हैं उन्हें जब मालूम हुआ कि इन्दौर में रेडियो स्टेशन की शुरुआत हो रही है तो रेडियो प्रसारण केंद्र देखने के लिए वे मालवा हाऊस पहुंच गई। उस वक्त तक कार्यक्रम प्रसारण की तैयारी शुरु हो रही थी। प्रसारण नहीं। उन्हें देखकर दिल्ली से आए किसी अधिकारी ने पूछा कि आप रेडियो पर बोलना चाहेंगी। वे कुछ सोचती इसके पहले ही उन्हें एक लाईन लिखकर दी  “आपकी चाय में कितनी चीनी डालूं”

कहा इसे पूछने के लहजे में पढ़कर बताओ

उन्होंने उसी अंदाज में पढ़ दिया।  अधिकारी को अच्छा लगा और इस तरह  पता चला कि उनका ऑडिशन टेस्ट हो गया और चाहें तो आकाशवाणी में काम कर सकती हैं। उन्होंने हां कह दिया।रणजीत जी की पढ़ाई इन्दौर के सेंट रफेल्स कांवेंट स्कूल में हुई। घर में भी पिताजी और मां अंग्रेजी में ही बात करते थे इसलिए उन्हें हिन्दी बहुत अच्छी नहीं आती थी। लेकिन उनका माइक्रोफोन पर आत्मविश्वास और आवाज का टेक्श्चर काफी प्रभावकारी था। इस तरह मप्र की पहली उद्घोषिका के रूप में रणजीत जी अनजाने में ही इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज कर चुकी है।

बचपन में पढ़ी गुरुमुखी से उन्हें हिन्दी सीखने में काफी मदद मिली लिखने में जरुर दिक्कत थी। जो आकाशवाणी में रहकर काफी कुछ सीखी। यहां एक दिन उनसे कहा गया कि एक नाटक लिखना है छुट्टी विषय पर पंद्रह मिनिट की अवधि का। हिन्दी में  लिखना उनके लिए मुश्किल था। उन्होंने लिखा और वो नाटक श्रोताओं द्वारा काफी सराहा गया। इंदौर आकाशवाणी पर वर्षों तक उसे चलाया गया।

शुरुआत में उन्हें आकाशवाणी से पारिश्रमिक के तौर पर केजुअल अनाउंसर के लिए दस रुपए एक शिफ्ट के मिलते थे। कुछ समय बाद जब स्थाई नौकरी मिली तब 100 रुपए प्रति माह मिलने लगे।

आगरा विश्वविद्यालय से दर्शनशास्र विषय में पूरे कला संकाय में टाॅप करने के साथ ही लाॅ में भी टाॅप करने वाली रणजीत जी शाॅर्ट हैंड और टाइपिंग भी जानती थी। वे कहती हैं उद्घोषक का काम किसी कार्यक्रम के माइक्रोफोन पर प्रस्तुति देने तक ही सीमित नहीं होता है बल्कि उसकी रूपरेखा बनाना, उस बारे में शोध करके प्रामाणिक जानकारी इकट्ठा करना आदि भी होता है। ये सब करने के बाद आकस्मिक परिस्थिति में यदि हम अपनी अतिरिक्त योग्यता का दोहन कर लें तो संकट मोचक के रूप में उभर कर आते हैं। एक किस्सा बताती हैं कि एक बार कपूरथला की महारानी आकाशवाणी आई। उनका इन्टरव्यू था और इसके लिए जैसा कि तय था दस रुपए मानदेय दिया जाता था। चुंकि वे महारानी थी और उन्हें दस रुपए देना उचित नहीं समझा इसलिए एक पत्र तैयार करना था कि महारानी अपनी स्वैच्छा से ये रकम नहीं ले रही है। इस पत्र पर उनके हस्ताक्षर भी होने थे। उस वक्त मालूम हुआ कि टाइपिस्ट छुट्टी पर है। महारानी के पास इतना समय नहीं था कि टाइपिस्ट को बुलाया जाए तब मैंने फटाफट शार्ट हैंड में नोट्स लिए और पत्र टाइप कर दिया। यह देखकर स्टेशन डायरेक्टर बेहद प्रसन्न हुए।

इंदौर आकाशवाणी के असिस्टेंट स्टेशन डायरेक्टर प्रसिद्ध साहित्यकार करतार सिंह दुग्गल के समय में रणजीत जी को काफी कुछ सीखने को मिला।

अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु,  इंदिरा गांधी, मोरारजी देसाई, राजीव गांधी से लेकर पृथ्वीराज कपूर, पंडित रविशंकर जैसी अनेकों हस्तियों के साक्षात्कार लिए।

रणजीत जी के कुछ समय बाद ही और भी उद्घोषिकाएं रेडियो से जुड़ती गई। इन्दु आनन्द,माया श्रीवास्तव, कमला पांडे,सुदेश हिन्दुजा, निम्मी माथुर, देवेन्दर कौर मधु आदि महिलाओं के नाम तो लोगों जुबां पर आ गये। इन्दु आनन्द ने 1965 में आकाशवाणी इन्दौर में उद्घोषक के बतौर अपनी सेवाएं देना आरंभ किया था। उनकी सुरीली आवाज से वे जल्दी ही लोगों की प्रिय हो गई। उन्होंने आकाशवाणी के अनेक नाटकों में मुख्य भूमिका निभाई। संदीप श्रोत्रिय की लिखी आकाशवाणी इंदौर की राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त प्रस्तुति “उस लड़की का नाम क्या है”, में इन्दुजी ने मुख्य किरदार बड़े प्रभावी ढंग से निभाया था।

इन्दौर आकाशवाणी से प्रसारित शाम ए ग़ज़ल की लोकप्रियता देवेन्दर कौर मधु की बेहतरीन उर्दू अदायगी के कारण ही थी। मधु जी बताती है कि परिवार में मां व पिताजी दोनों ही बहुत अच्छी उर्दू जानते थे इसलिए मुझे भी शेरों शायरी का शौक हो गया। यही वजह थी कि मैं शाम ए ग़ज़ल कार्यक्रम को इतने अच्छे से कर पाई। अपने चालीस साल के कार्यकाल में मधु जी ने विशेष श्रोताओं के कार्यक्रम जैसे ग्राम लक्ष्मी, खेती गृहस्थी, कुछ बातें कुछ गीत, मनभावन फरमाइशी गीत आदि के जरिए शहरी व दूरदराज के लोगों के दिलों दिमाग में जगह बना ली थी। वे कहती हैं उद्घोषक तो रेडियो की रीढ़ होते हैं। उन दिनों हम लोगों की एक सितारा जिंदगी हुआ करती थी।

उस दौर में किसी भी क्षेत्र की कोई नामचीन हस्ती इन्दौर आती तो वो आकाशवाणी के मालवा हाऊस जरुर आती थी। मन्ना डे, जगजीत सिंह, मन्नू भंडारी, नरेन्द्र शर्मा, जयदेव,गुलाम अली, नौशाद साहब ऐसे अनेक लोगों के साक्षात्कार देवेन्दर कौर मधु ने लिए। इससे जुड़ी एक घटना बताती हैं कि नौशाद साहब को लता मंगेशकर अवॉर्ड मिलना था। मैंने उनसे इन्टरव्यू के दौरान पूछा कि लता जी को आपने बनाया है और आपको उनके नाम का अवार्ड दिया जा रहा है। इस पर उन्होंने कहा कई बार रचना रचनाकार से बड़ी हो जाती है। जैसे रामचरितमानस तुलसीदास जी बड़ी हो गई। इसलिए यह सम्मान मेरे लिए काफी महत्वपूर्ण है। उद्घोषक के लिए उच्चारण का शुद्ध और साफ होना बहुत जरूरी है। इस बारे में कहती हैं कि खेती गृहस्थी को मैं ग्रहस्थी कहती थी जिसे हमारे साथी लोगों ने सुधारा। जबकि आजकल के युवाओं में वो बात नहीं है।  अपने रिटायरमेंट के पहले 2014 की बात बताते हुए कहती हैं कि उस वक्त एक उद्घोषक नया आया था वो आकाशवाणी का इन्दौर स्टुडियो को आकाशवाणी का इन्दोर श्टुडियो बोलता था। उसे मैंने इस बात के लिए उसे टोका तो उसने मेरी सलाह अनसुनी कर दी। बहरहाल देवेन्दर कौर मधु ने आकाशवाणी के माहौल को भरपूर जिया और अपनी सेवाएं बड़ी जिम्मेदारी और जिंदादिली के साथ दी। यही वजह थी कि टेलीविजन आने के बाद भी  रेडियो पर उनकी आवाज का जादू चलता रहा।

उसी दौर में निम्मी माथुर की आवाज का जादू भी सर चढ़कर बोलता था। चुंकि निम्मी जी को संगीत का काफी शौक था और शिक्षा भी संगीत और चित्रकला विषयों के साथ हुई तो आकाशवाणी के कार्यक्रम में भी उनकी प्रस्तुति शास्त्रीय संगीत के इर्द-गिर्द अधिक रही। उनका रागों पर आधारित एक कार्यक्रम था। जो काफी प्रसिद्ध हुआ। लगभग बीस साल इन्दौर आकाशवाणी में काम करने के बाद निम्मी माथुर विवाह के बाद मुम्बई में तबादला लेकर वहीं बस गई । विवाह पश्चात उनका नाम निम्मी माथुर मिश्रा हो गया। उन्होंने पंद्रह साल से अधिक समय तक मुम्बई विविध भारती में काम किया। इस दौरान फिल्मी दुनिया से जुड़े कई सितारों के इंटरव्यू किए। निम्मी माथुर मिश्रा इन्दौर आकाशवाणी में जब तक रहीं पत्रोत्तर कार्यक्रम किया और मुम्बई में भी पत्रावली कार्यक्रम की जिम्मेदारी निभाई। काम के प्रति लगन इतनी थी कि उनकी कोशिश रहती थी अधिक से अधिक पत्रों को वे पढ़ें और लोगों के प्रश्नों के जवाब दें। उस वक्त पत्रों की संख्या हजारों में होती थी। इतने पत्रों में से पढ़कर चयन करना बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य था।

वर्तमान में सुधा शर्मा इंदौर आकाशवाणी में वरिष्ठ उद्घोषक के रूप में कार्य कर रही है। उनका कहना है कि विभिन्न जन संचार माध्यमों के बीच रेडियो की उपादेयता को बनाए रखना बेशक बड़ा मुश्किल काम है लेकिन रेडियो आज भी सबसे सशक्त संचार माध्यम है। इसीलिए प्रधानमंत्री जी भी रेडियो के जरिए ही लोगों से रुबरु होते हैं। मन की बात ठेट गांव के लोगों तक सुनी जाती है। आज के भ्रामक समय में भी आकाशवाणी ही सही और पुख्ता जानकारी मुहैया करा रहा है।

भोपाल आकाशवाणी मप्र के बनने के साथ ही आकार में आया।

नसरीन अहमद, परवीन कुरैशी, कांति वर्मा, कमला सक्सेना, मीनाक्षी वर्मा, लीला बावड़े, सुषमा तिवारी,चित्रा भादुड़ी, पुष्पा तिवारी,जया आर्य, डाॅली मल्होत्रा, पापिया दास गुप्ता,अमिता त्रिवेदी, सावनी राजू जैसी आवाजों के दम पर आकाशवाणी भोपाल की मजबूत इमारत तैयार हुई।

भोपाल रेडियो स्टेशन पर परवीन कुरेशी ने अपने कार्यकाल में एक नायाब कार्यक्रम शुरू किया टेलीफ़ोन पर फरमाइशी गाने सुनाने का। जो लोगों को रेडियो से जीवन्त जोड़ रहा था। इस कार्यक्रम ने भोपाल आकाशवाणी को सफलता के एक अलग मुकाम पर पहुंचाया।

जया आर्य तमिल भाषी होने के बाद भी हिन्दी की उत्कृष्ट उद्घोषिका रही। चुंकि पिता आर्मी में थे तो भारत के विभिन्न हिस्सों में इन्हें रहने का अवसर मिला। इस वजह से हिंदी भाषा धाराप्रवाह बोल सकी। पुणे में कुछ समय केजुअल अनाउंसर का काम करने के बाद जया जी को मुम्बई आकाशवाणी में सीनियर अनाउंसर की स्थाई नौकरी मिल गई। आकाशवाणी मुम्बई में ही कार्यरत ज्ञान सिंह आर्य से विवाह के बाद जया डेविड से जया आर्य के रूप में लोगों के बीच जानी जाने लगी। कुछ ही दिनों बाद पति का तबादला जगदलपुर में स्टेशन डायरेक्टर के पद पर हो गया तो जया जी भी पति के साथ जगदलपुर आकाशवाणी में आ गई। सात वर्ष जगदलपुर रहने के बाद दोनों का तबादला भोपाल हो गया और सेवानिवृत्ति तक भोपाल में ही रही। उनके फोन इन कार्यक्रम को लोगों ने बहुत पसंद किया। इसके अलावा जया आर्य ने मंचीय संचालन भी बड़ी कुशलता से किए। प्रख्यात उद्घोषिका होने के नाते उभरते हुए कई उद्घोषकों को निखारने का काम जया आर्य ने किया।

भोपाल आकाशवाणी के लिए पपिया दासगुप्ता भी जानी मानी हस्ती रही हैं।  उनका योगदान नाटकों के माध्यम से उल्लेखनीय रहा। वे आकाशवाणी की ए ग्रेड कलाकार रही है। इन्होंने लगभग सौ नाटकों में अपनी आवाज दी है।

आकाशवाणी में समय की पाबंदी का काफी महत्व है। कहा जाता है कार्यक्रम अधिकारी लीला बावड़े के कार्यकाल में समय से न पहुंचने पर एक प्रमुख राजनीतिक हस्ती को बगैर कार्यक्रम दिए ही लौटना पड़ा था।

भोपाल रेडियो स्टेशन में कांति वर्मा के लिखे चिंतन को लोग सुनते और उस पर विचार करते थे। मीनाक्षी वर्मा के नाटक हवामहल में आते थे। जिन्हें की राष्ट्रीय रेडियो नाटक से पुरस्कृत किया गया।कार्यक्रम अधिकारी सुषमा तिवारी कार्यक्रम का प्रारुप बनाती थी। कार्यक्रमों को कैसे बेहतर बनाया जाए वे इसी कोशिश में रहती थी।

विख्यात पटकथा लेखक उषा दीक्षित ने अपने केरियर की शुरुआत भोपाल आकाशवाणी से ही की। उषा जी रेडियो के लिए नाट्य लेखन करने के साथ साथ केजुअल अनाउंसर भी रही हैं। कई सारे लोकप्रिय धारावाहिक जैसे बालिका वधू आदि की पटकथा इन्होंने लिखी है। फिलहाल उषा दीक्षित द्वारा लिखा गया सोनी टीवी पर प्रसारित अहिल्या बाई सीरियल लोगों को काफी पसंद आ रहा है।

भोपाल स्टेशन से ममता चंद्राकर का भी नाता रहा है। जिन्हें छत्तीसगढ़ की लता मंगेशकर कहा जाता है। लोक गायिकी में आपको पद्मश्री पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। छत्तीसगढ़ सरकार ने ममता जी के लोक संगीत और कला क्षेत्र में योगदान को देखते हुए उन्हें इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ छग में कुलपति के पद की जिम्मेदारी सौंपी है।

प्रदेश की पहली महिला समाचार वाचक

भोपाल रेडियो स्टेशन से प्रसारित प्रादेशिक समाचारों में पुष्पा तिवारी की आवाज को लोग आज भी याद करते हैं।

पुष्पा जी प्रदेश में घटित प्रमुख घटनाओं को स्वयं समाचार के रुप में ढालती थी और फिर उन्हें पढ़ती थी। समाचारों के बाद वो रोजगार समाचार भी पढ़ती थी। इसे सुनने के लिए पढ़े लिखे बेरोजगार युवा समय से रेडियो शुरू कर देते थे और पूरे मोहल्ले में पुष्पा जी की आवाज सुनाई देती थी।

आजकल राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी के राष्ट्रीय समाचारों में इंदौर की मनीषा व्यास खन्ना की आवाज पूरे भारत वर्ष में सुनाई देती है। बड़वाह में जन्मी और इन्दौर देवी अहिल्या विश्वविद्यालय से जनसंचार में उपाधि लेने के बाद मनीषा जी ने दिल्ली का रुख़ किया। सन 1993-94 में जनसत्ता अखबार में इंटर्नशिप करने के बाद आकाशवाणी से जुड़ गईं। तभी से मनीषा व्यास खन्ना समाचार प्रभाग में समाचार वाचक एवं अनुवादक की जिम्मेदारी निभा रही है।

अमिता त्रिवेदी 1997 से भोपाल आकाशवाणी में वरिष्ठ उद्घोषक है। रेडियो के प्रसारण पर विस्तार से चर्चा करते हुए बताती है कि प्रसारण प्रक्रिया तीन स्तरों पर होती है।  स्टूडियो जहां से कार्यक्रम रिले होते हैं। यहीं पर उद्घोषक और बाहर से बुलाए गए अतिथि या लोक कलाकार आदि होते हैं। दूसरा है ड्यूटी रुम जहां ट्रांसमिशन एक्जीक्यूटिव होते हैं। इनकी जिम्मेदारी होती है कि कार्यक्रम में क्या जा रहा है। उसमें किसी तरह का व्यवधान तो नहीं आ रहा। तीसरा होता है कंट्रोल रूम। यहां एक इंजीनियर होता है, एक असिस्टेंट इंजीनियर और एक टैक्नीशियन होता है। ये कक्ष तमाम तकनीकी पहलुओं को देखता है। इन तीनों के समन्वय से ही कोई भी कार्यक्रम सुचारु रूप से प्रसारित हो पाता है। इनका मानना है कि रेडियो के सिस्टम को आम लोगों को समझना चाहिए कि सत्तर से भी अधिक सालों से भारतीयता की पहचान जन जन तक पहुंचाने में ये कैसे काम कर रहा है।

उन्होंने कहा कि तकनीकी क्रांति की शुरुआत रेडियो से हुई ऐसे में डिजिटल युग में कदमताल जरूरी है इसे ध्यान में रखते हुए रेडियो को एप के जरिए मोबाइल पर भी अब सुना जा सकता है।

जबलपुर आकाशवाणी से जुड़ी सावनी राजू इसके पूर्व भोपाल में थी। यहां इन्होने एस एम एस गीत माला प्रोग्राम शुरू किया था। इसमें श्रोता एस एम एस के जरिए गीत की फरमाइश भेजते और उन्हें तत्काल उनकी पसंद का गाना सुना दिया जाता। जमुनिया एक धारावाहिक जिसमें केंद्र सरकार की विभिन्‍न योजनाओं और कार्यक्रमों के बारे में जागरूक किया गया है उसकी नरेटर सावनी राजू रही। ये कार्यक्रम राष्ट्रीय चैनल के साथ साथ प्रदेश के सभी केंद्रों से प्रसारित हुआ था।

ग्वालियर आकाशवाणी में वरिष्ठ उद्घोषक के पद पर कार्यरत तुलिका शर्मा ग्वालियर आकाशवाणी में लगभग 23 साल से कार्यरत हैं। इनका मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में रेडियो की महत्ता आज भी बनी हुई है। गांवों से काफी मात्रा में पत्रों के आने का सिलसिला बना हुआ है। इससे जाहिर है कि ग्रामीण अंचल में रेडियो का क्रेज अभी भी है।

रीवा आकाशवाणी की शुरुआत 1977 में हुई थी। इसके शुरुआती समय से ही शासकीय आयुर्वेदिक महाविद्यालय में संस्कृत की प्राध्यापक रही डॉ प्रतिभा जैन जुड़ गईं थीं। प्रारंभ में इन्होंने आकाशवाणी के लिए संस्कृत नाटकों का हिंदी रुपांतरण किया। कालीदास के कुमार संभव नाटक का सबसे पहले हिन्दी रुपांतरण प्रतिभा जैन ने ही किया। जिसे बाद में विविध भारती की विदेश सेवा से भी प्रसारित किया जाता रहा है। इसके अलावा मेघदूत को सरल हिन्दी में लिखने का अत्यंत चुनौती भरा काम भी किया। इन्होंने बुद्ध, महावीर, इंदिरा गांधी आदि पर अनेक रूपक लिखे। नाटकों में अभिनय भी किया और आकाशवाणी की ए ग्रेड कलाकार का दर्जा हासिल किया।

आशा पांड्या आकाशवाणी रीवा में उसके शुरुआती दौर से ही जुड़ी थी। आशा जी ने बताया कि उस समय आकाशवाणी का नेटवर्क इतना सशक्त हुआ करता था कि गुमशुदा लोगों का अनाउंसमेंट होता था और लोग मिल जाया करते थे।

कहती हैं कि भाषा, संस्कृति, लोकजीवन से सीधे जोड़ने और समझने का कंप्लीट पैकेज होता है रेडियो।

रीवा में 2007 से कार्यरत केजुअल अनाउंसर सरगम बताती हैं कि अब रीवा में स्थाई अनाउंसर कोई भी नहीं है। केजुअल अनाउंसर ही स्टेशन संभाल रहे हैं। इन्हें माह में छै दिन अवसर दिया जाता है। इसके लिए प्रति शिफ्ट अभी तक 1300 रुपए मिलते थे। पिछले माह से 1700 रुपए कर दिए गए हैं।कई समय से स्थाई उद्घोषक की नियुक्तियां बंद कर दी गई है। जो लोग सेवानिवृत्त भी हो रहे हैं उनके स्थान पर भी अस्थाई उद्घोषक ही रखें जा रहे हैं। सरकार तक हमारी दिक्कतों को पहुंचाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर संगठन भी बनाया गया है।लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई विशेष काम नहीं हुआ है।

आकाशवाणी में उद्घोषिका से इतर यदि महिलाओं की बात करें तो बेशक ये संख्या काफी कम है। इसके लिए दोष सिस्टम का नहीं है बल्कि महिलाओं का प्रतियोगी परीक्षाओं में हिस्सा न लेना है। स्टेशन डायरेक्टर, असिस्टेंट स्टेशन डायरेक्टर, अभियंताओं का चयन संघ लोकसेवा आयोग कर्मचारी चयन आयोग परीक्षाओं के आधार पर होता है। इसकी माहिती न होने पर बहुत कम लड़कियां इस परीक्षा में भाग लेती है।

संघ लोकसेवा आयोग से चयनित होकर

इन्दौर आकाशवाणी में स्टेशन डायरेक्टर रही गीता मरकाम भोपाल, जबलपुर, खंडवा, रायपुर, रीवा आदि जगहों पर भी कार्य कर चुकी हैं। डिंडोरी जिले के बहुत छोटे से गांव में जन्मी गीता जी की प्रारम्भिक शिक्षा अपने गांव में ही हुई। उसके बाद डिंडोरी के वनवासी छात्रावास में हाई स्कूल तक पढ़ाई की। उच्च शिक्षा इंदौर के कस्तूरबा ग्राम ग्रामीण संस्थान से प्राप्त की। राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर करने के बाद संघ लोक सेवा आयोग के जरिए स्टेशन डायरेक्टर के पद पर नियुक्त हुई। गीता जी लोक गायिकी से जुड़ी होने के कारण जहां जहां भी रही वहां के गांवों में जाकर छुपी हुई लोकगायकी की प्रतिभाओं को आकाशवाणी तक लाती थी और उन्हें अवसर देती थी। गीता जी के पति बाबूराम मरकाम आकाशवाणी में प्रादेशिक समाचार वाचक रहे हैं। सन 2013 में दूरदर्शन के उप महानिदेशक के पद से गीता मरकाम सेवा निवृत्त हुई।

रेडियो का एक प्रसिद्ध चैनल विविध भारती है। इसका प्रसारण 3 अक्टूबर 1957 में महान कवि, गीतकार और प्रशासक नरेन्द्र शर्मा की अगुवाई में  किया गया था। विशुद्ध रूप से मनोरंजक कार्यक्रमों के लिए यह चैनल बनाया गया था। इस चैनल की लोकप्रियता बहुत जल्दी ही देश में तो हो ही गई थी साथ ही सरहद के पार भी इसे काफी सुना जाने लगा। इसी लोकप्रियता को देखते हुए 1966 में इसे विज्ञापन सेवा में तब्दील कर दिया गया। आज के समय में अनेक प्रायवेट एफ एम चैनलों के आने के बाद भी विविध भारती की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है। भोपाल रेडियो स्टेशन में कार्य कर चुकी रेखा श्रीवास्तव का नाम इसलिए लिया जाता है कि उन्होंने भोपाल स्टेशन के रोचक कार्यक्रमों के कारण सर्वाधिक राजस्व अर्जित किया था।

मप्र से ताल्लुक रखने वाली कई उद्घोषिकाएं मुम्बई विविध भारती में भी अपनी आवाज का जादू बिखेर रहे हैं।

जबलपुर शहर की बहू और आवाज के जादूगर युनुस खान की पत्नी ममता सिंह सखी सहेली कार्यक्रम के जरिए लोगों में गहरी पैठ बना चुकी है। आवाज की दुनिया के सितारे जितने युनुस खान है उतनी ही बड़ी शख्सियत ममता सिंह भी है। प्रयागराज से नैमेत्तिक उद्घोषक के रूप में आकाशवाणी से जुड़ने के बाद  मुम्बई  विविध भारती तक की  ममता सिंह की यात्रा काफी सफल रही है। सखी सहेली कार्यक्रम मील का पत्थर साबित हुआ है। ममता सिंह को आकाशवाणी की सर्वश्रेष्ठ उद्घोषिका का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है। इसके अलावा

आपकी लिखी ‘राग मारवा’ पुस्तक (कहानी संग्रह) को मप्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन का वागीश्वरी पुरस्कार प्राप्त हुआ है। इसी पुस्तक पर महाराष्ट्र सरकार से प्रेमचंद सम्मान भी मिला है।

दमोह जिले में हटा तहसील की रहने वाली विधि प्रवीण जैन आकस्मिक उद्घोषिका के रूप में विविध भारती मुम्बई में सफलता पूर्वक अपनी सेवाएं दे रही है।

देवास में जन्मी एकता बक्षी कानूनगो ने आकाशवाणी इन्दौर से उद्घोषिका की शुरुआत  2011 में की। वे 2013 में मुम्बई चली गई और यहां विविध भारती में जयमाला, हिट सूपर हिट, गाने ने जमाने के जैसे कार्यक्रमों को स्वतंत्र रूप से प्रस्तुत किया। 2014 में आकाशवाणी के हैदराबाद  केंद्र से रेनबो चैनल में गीत गाता चल, रेट्रो ऑर और दिल की बात जैसे फोन इन कार्यक्रम संचालित किए। यहां तीन वर्ष तक एकता जी ने अपनी सेवाएं दी।वर्तमान में पुणे आकाशवाणी केंद्र से जुड़कर कार्य कर रही है।

आकाशवाणी विविध भारती के कार्यक्रमों का केनवास काफी विशाल है।

ये माध्यम सूचना, ज्ञान और मनोरंजन तो प्रदान करता ही है स्वास्थ्य संबंधी जानकारी और जागरूकता के प्रचार प्रसार में कारगर सिद्ध हुआ है।कोरोना के समय रेडियो की जरूरत एक बार फिर से बड़ी ताकत के साथ उभरी है। शिक्षा के क्षेत्र में देखा जाए तो जब स्कूल बंद हैं और गांवों में बच्चों के पास ऑनलाइन क्लासेस के लिए स्मार्टफोन नहीं है तब रेडियो ही उनका शिक्षक बनकर सामने आया। रेडियो और विविध भारती के समन्वय प्रयास से शैक्षिक कार्यक्रम प्रसारित किए जा रहे हैं।

कोरोनावायरस के खिलाफ लड़ाई में भी लोगों को जागरूक करने की महती भूमिका निभा रहा है।

कई जानलेवा बीमारियों के टीकाकरण अभियान की सफलता में रेडियो की निर्णायक भूमिका रही है। लोगों को उन्हीं की जुबान में विभिन्न सरकारी योजनाओं की जानकारी देने से वे लाभ ले पा रहे हैं। रेडियो की भूमिका जनहितकारी रही है। जहां सोशल मीडिया की पहुंच नहीं है वहां रेडियो की आवाज सुगमता से उपलब्ध है। लेकिन पिछले कुछ समय से यह माध्यम घोर उपेक्षा का दंश झेल रहा है। सभी स्टेशनों पर स्थाई नियुक्ति बंद हो गई है। जहां पंद्रह कर्मियो की जरूरत है वहां दो या तीन लोगों से काम चलाया जा रहा है। सरकार को इस ओर ध्यान देने की अत्यंत आवश्यक है। सरकारी उपेक्षा से सर्वहारा वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होगा।इसकी उपयोगिता को अनदेखा किया जाना इसके मूलभूत उद्देश्य सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय के प्रति अन्याय होगा।

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