राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने ऑल इंडिया स्टेट ज्यूडिशियल एकेडमीज डायरेक्टर्स रिट्रीट कार्यक्रम का किया शुभारंभ

राष्ट्रपति कोविंद ने ऑल इंडिया स्टेट ज्यूडिशियल एकेडमीज डायरेक्टर्स रिट्रीट कार्यक्रम का किया शुभारंभ

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ऑल इंडिया स्टेट ज्यूडिशियल एकेडमीज डायरेक्टर्स रिट्रीट कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने  बहुत ही पते की बात कही है कि सभी राज्यों के उच्च न्यायालय अपने प्रदेश की अधिकृत भाषा में जन-जीवन के महत्वपूर्ण पक्षों से जुड़े निर्णयों का प्रमाणित अनुवाद करें और उच्चतम न्यायालय की  तरह उसे एक साथ उपलब्ध और प्रकाशित कराएं। यह अच्छा विचार है और इसका मुक्त कंठ से स्वागत किया जाना चाहिए। अच्छा तो यह होता  कि सर्वोच्च न्यायालय और सभी उच्च न्यायायालय वादी और प्रतिवादी को उसकी अपनी भाषा में फैसला सुनाते। हिंदी के लिए अपने छात्र जीवन से से संघर्ष कर रहे चंद्रशेखर उपाध्याय ने तो अनेक अवसरों पर यह बात कही भी है कि बड़ी अदालतों में अंग्रेजी में बहस होती है। न्यायाधीश अंग्रेजी में निर्णय सुनाते हैं।

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अधिवक्ता अंग्रेज में बहस करते हैं। बेचारा वादी-प्रतिवादी तो समझ ही नहीं पाता कि जज ने उसके पक्ष में फैसला दिया या विपक्ष में। वकील ने हमारे पक्ष में जिरह की या विपक्ष में, उसे तो न्यायपालिका पर भरोसा होता है कि उसके साथ अन्याय नहीं होगा लेकिन जिस  भाषा को वह जानता-समझता नहीं, उसमें बहस और निर्णय क्या भोले-भाले  वादियों और प्रतिवादियों के साथ अन्याय नहीं है? यह अच्छी बात है कि राष्ट्रपति ने भी न्यायालयीय फैसलों के अनुवाद की बात कही है लेकिन यह फैसले के बाद की बात है। वादी और प्रतिवादी को फैसला भले ही अंग्रेजी में सुनाया जाए लेकिन उसकी प्रति उन्हें उनकी भाषा में ही उपलब्ध कराई जाए। बहस कम से कम हिंदी या संबंधित राज्य की भाषा में ही होने चाहिए। वादी-प्रतिवादी के बयान भी उन्हीं की भाषा में होने चाहिए। न्यायिक शुचिता की अवधारणा को अगर मजबूती देनी है तो ऐसा करना लाजिमी है।

ऑल इंडिया स्टेट ज्यूडिशियल एकेडमीज डायरेक्टर्स रिट्रीट कार्यक्रम में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस शरद अरविंद बोबडे, राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान, मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश मोहम्मद रफीक भी मौजूद रहे। राष्ट्रपति ने तो यहां तक कहा कि उन्हें बहुत प्रसन्नता हुई, जब उनके विनम्र सुझाव पर उच्चतम न्यायालय ने इस दिशा में कार्य करते हुए अपने निर्णयों का अनुवाद नौ भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराया। संविधान की उद्देशिका को तो उन्होंने संविधान की आत्मा करार दिया ही, उसमें वर्णित चार आदर्शों-न्‍याय, स्‍वतंत्रता, अवसर की समानता और बंधुता की प्राप्ति  के संकल्प का भी जिक्र किया।

न्याय को सर्वोपरि निरूपित किया। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस शरद अरविंद बोबडे ने कहा कि आज का कार्यक्रम संवाद, नए आयाम स्थापित करता है  न्याय एक अनोखी प्रक्रिया है। न्यायदान के लिए मानव स्वभाव, सामाजिक परिवेश, राजनीतिक व्यवस्था को समझना जरूरी है।  समय के साथ विकसित होते कानून को समझना जरूरी है। ऐसे में किसी भी न्यायाधीश को न्याय व्यवस्था को तैयार करने की प्रक्रिया को समझना एक रोचक विषय है। इस विषय पर काफी शोध हुआ है। ें न्यायिक अकादमी स्थापित हुई  है जो उत्तम कार्य कर रही है पर न्यायिक प्रशिक्षण के तौर तरीकों को बदलना होगा। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान  का मानना है कि मध्यप्रदेश सरकार जो निष्कर्ष निकलेंगे, उन्हें उच्च न्यायालय के साथ मिलकर जमीन पर उतारने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। त्वरित न्याय कैसे मिले, सस्ता न्याय और सुलभ न्याय कैसे मिले। इस दिशा में बेहतर परिणाम प्राप्त करने के लिए दक्ष मानव संसाधन की जरूरत है। जितनी भी व्यवस्थाएं मानव सभ्यता के उदय के बाद बनीं हैं, अंतत: उनका एक ही लक्ष्य है, एक ही केंद्र है आम आदमी को कैसे सुखी कर पाएं। उन्होंने कहा कि रोटी, कपड़ा, मकान आदि भौतिक आवश्यकताएं यदि पूरी हो जाएं तो मनुष्य सुखी हो जाएगा।

यह अच्छी बात है कि न्याय व्यवस्था पर चिंतन होने लगा है और समाज जीवन के हर तबके से सस्सता, सुलभ और गुणवत्ता पूर्ण न्याय की बात होने लगी है लेकिन इसके लिए जरूरी है कि वकील और न्यायाधीश दोनों ही युगानुरूप सोचें और युगानुरूप ही पहल करें अन्यथा शाब्दिक जुगाली के अतिरिक्त इस विचार मंथन का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय के माननीय न्यायाधीशों, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को यह तो पता होना ही चाहिए कि लगभग डेढ़ दशक से वाराणसी जिला एवं सत्र न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता पं. श्याम जी उपाध्याय संस्कृत में ही आवेदन देते हैं। संस्कृत में ही बहस करते हैं और एक मुस्लिम जज ने तो संस्कृत में फैसला सुनाने का भी कीर्तिमान स्थापित किया था। जब वाराणसी में ऐसा होसकता है तो पूरे देश की क्या छोटी, क्या बड़ी सभी अदालतों में उस राज्य की भाषा में आवेदन क्यों नहीं दिए जा सकते। वकील उसी भाषा में बहस क्यों नहीं कर सकते और जज उसी भाषा में निर्णय क्यों नहीं सुना सकते। अगर कोई कठिनाई हो तो दुभाषिये का इस्तेमाल हो सकता है। अनुवाद किया हुआ निर्णय तुरंत वादी-प्रतिवादी को उपलब्ध कराया जा सकता है। राष्ट्रपति के आग्रह का अगर सर्वोच्च न्यायालय ने सम्मान किया है तो उसे दो कदम आगे बढ़कर वादी-प्रतिवादी की दुविधा का भी समाधान करना चाहिए। काश, ऐसा कुछ हो पाता।

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