Mohini Ekadashi

मोहिनी एकादशी पर ऐसे करें भगवान विष्णु को प्रसन्न

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नई दिल्ली। हिंदू धर्म में मोहिनी एकादशी (Mohini Ekadashi) तिथि का बहुत अधिक महत्व होता है। यह तिथि विष्णु भगवान को समर्पित होती है। इस दिन विधि- विधान से विष्णु भगवान की पूजा- अर्चना की जाती है। हिंदू पंचांग के अनुसार हर माह में दो बार एकादशी तिथि पड़ती है। एक कृष्ण पक्ष में और एक शुक्ल पक्ष में। वैशाख माह में शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी तिथि को मोहिनी एकादशी (Mohini Ekadashi) के नाम से जाना जाता है।

इस पावन दिन भगवान विष्णु के मोहिनी स्वरूप की पूजा- अर्चना की जाती है। इस पावन दिन भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए श्री विष्णु चालीसा का पाठ जरूर करें।

जाने कब है कामदा एकादशी और व्रत विधि

भगवान विष्णु ने वैशाख शुक्ल एकादशी को मोहिनी स्वरूप धारण किया था। इसलिए इस दिन श्रद्धालु भगवान विष्णु के मोहिनी स्वरुप की पूजा कर व्रत रखते हैं। इस व्रत को करने से सभी दु:ख और पाप से मुक्ति मिलती है। ऐसी मान्यता है कि व्रत की कथा का पाठ करने मात्र से ही 1000 गायों के दान करने के बराबर पुण्य मिलता है।

Mohini Ekadashi
Mohini Ekadashi

व्रत कथा

सरस्वती नदी के किनारे भद्रावती नाम का एक नगर था। जहां पर एक धनपाल नाम का वैश्य रहता था, जो धन-धान्य से परिपूर्ण था। वह सदा पुण्य कर्म में ही लगा रहता था। उसके पांच पुत्र थे। इनमें सबसे छोटा धृष्टबुद्धि था। वह पाप कर्मों में अपने पिता का धन लुटाता रहता था। एक दिन वह नगर वधू के गले में बांह डाले चौराहे पर घूमता देखा गया। इससे नाराज होकर पिता ने उसे घर से निकाल दिया तथा बंधु-बांधवों ने भी उसका साथ छोड़ दिया।

Mohini Ekadashi
Mohini Ekadashi

वह दिन-रात दु:ख और शोक में डूब कर इधर-उधर भटकने लगा। एक दिन वह किसी पुण्य के प्रभाव से महर्षि कौण्डिल्य के आश्रम पर जा पहुंचा। वैशाख का महीना था। कौण्डिल्य गंगा में स्नान करके आए थे। धृष्टबुद्धि शोक के भार से पीड़ित हो मुनिवर कौण्डिल्य के पास गया और हाथ जोड़कर बोला,  ब्राह्मण ! द्विजश्रेष्ठ ! मुझ पर दया कीजिए और कोई ऐसा व्रत बताइए जिसके पुण्य के प्रभाव से मेरी मुक्ति हो।’

तब ऋषि कौण्डिल्य ने बताया कि वैशाख मास के शुक्लपक्ष में मोहिनी नाम से प्रसिद्ध एकादशी का व्रत करो। इस व्रत के पुण्य से कई जन्मों के पाप भी नष्ट हो जाते हैं। धृष्टबुद्धि ने ऋषि की बताई विधि के अनुसार व्रत किया।  जिससे वह निष्पाप हो गया और दिव्य देह धारण कर श्री विष्णुधाम को चला गया।

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