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देहरादून : पारंपरिक खड़ी होली को घर-घर पहुंचा रहे युवा होल्यार

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देहरादून। देशभर में मनाए जाने वाले रंगों के पर्व होली का एक अलग ही पारम्परिक (Traditional Khadi Holi ) रंग उत्तराखंड में देखने को मिलता है। बता दें कि उत्तराखंड में होली के पर्व से दो माह पहले ही पारंपरिक खड़ी होली (Traditional Khadi Holi )  और बैठकी होली का दौर शुरू हो जाता है जिसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि दोनों ही तरह की होली में उत्तराखंड के पारंपरिक गीतों की झलक देखने को मिलती है। इन दोनों होलियों में उत्तराखंड की संस्कृति रचती-बसती है जिसके कारण देवभूमि में खड़ी (Traditional Khadi Holi ) और बैठकी होली का महत्व अपने आप ही बढ़ जाता है। पांरपरिक गीतों की ये लोक होली बृज की होली की याद दिलाती है।

मौल्यार ऐगे की टीम उत्तराखंड की पारंपरिक खड़ी होली (Traditional Khadi Holi )  को घर-घर तक पहुंचा रही है। इस टीम में कई युवा होल्यार भी शामिल हैं।

पारंपरिक खड़ी होली मनाते होल्यार..

बात अगर राजधानी देहरादून की करें तो राजधानी में साल 2016 से युवाओं का एक समूह उत्तराखंड की पारंपरिक खड़ी होली (Traditional Khadi Holi )  को घर-घर ले जाने का काम कर रहा है। मौल्यार ऐगे सामाजिक संगठन साल 2016 से पहाड़ की संस्कृति को जहां तक पहुंचाने के कार्य में जुटा हुआ है। इसी के तहत हर साल होली के मौके पर युवाओं की ये टोली पहाड़ी परिधान, रीति-रिवाज, पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ घर-घर जाकर खड़ी होली की प्रस्तुति देती है।

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उत्तराखंड की पारंपरिक खड़ी होली (Traditional Khadi Holi ) की झलक इन युवा होल्यारों के माध्यम से दिख रही है। इसमें यह युवा होल्यार बृज मंडल में गाए जाने वाली होली के रागों को उत्तराखंड के पारंपरिक अंदाज में गा रहे हैं। इसके साथ ही इसमें यह युवा उत्तराखंड के पारंपरिक वाद्य यंत्रों का भी इस्तेमाल कर रहे हैं जिसमें ढोल-दमाऊ, बांसुरी, हुड़का, ढोलक वाद्य यंत्रों के साथ खड़ी होली की प्रस्तुति दी जा रही है।

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उत्तराखंड की पारंपरिक खड़ी होली (Traditional Khadi Holi ) 

‘मौल्यार ऐगे’ के होल्यार घर-घर जाकर गीतों और रंगों के जरिये उल्लास को बढ़ा रहे हैं। ये टीम लोक सांस्कृतिक के रंगों की छटा बिखेरते हुए पारंपरिक होली के एक नया आयाम दे रहे हैं जिसमें की आज के युवा भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं।

युवा होल्यारों की टोली ‘मौल्यार ऐगे’ के सदस्य अबु रावत बताते हैं कि साल 2016 में ‘मौल्यार ऐगे’ सामाजिक संगठन का गठन किया गया जिसका उद्देश्य उत्तराखंड के पहाड़ों की पारंपरिक संस्कृति को घर-घर तक पहुंचाना है जिसमें सबसे अहम और देश भर में अपनी अलग पहचान रखने वाली उत्तराखंड की पारंपरिक खड़ी और बैठकी होली शामिल है।

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