तालिबान

तालिबान जिस महिला की करने जा रहा था हत्या, वह सांसद बन अपनी बात मनवाई

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नई दिल्ली। अफगानिस्तान की रहने वाली फौजिया कूफी का बचपन का सपना डॉक्टर बनना था, लेकिन जब 90 के दशक में उनके देश में तालिबान राज स्थापित हुआ। तो उनका ये सपना चकनाचूर हो गया। बता दें कि तालिबान ने महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से दूर घरों में कैद होने के लिए मजबूर कर दिया। जब उन्होंने सियासत में कदम रखा तो उन्हें मारने की कोशिश की गई।

अब उसी महिला ने तालिबान के साथ शांति प्रक्रिया के लिए बातचीत में मुख्य भूमिका भी निभाई

अब उसी महिला ने तालिबान के साथ शांति प्रक्रिया के लिए बातचीत में मुख्य भूमिका भी निभाई। उनका कहना है कि ये मेरे लिए महत्वपूर्ण है। मैने बातचीत में अफगानिस्तान की महिलाओं की दमदार नुमाइंदगी की है। 1996 से 2001 के दौरान तालिबान ने महिलाओं की शिक्षा, रोजगार पर प्रतिबंध लगा दिया था और अपना खुद का इस्लामिक कानून देश में लागू कर दिया। जिसमें पत्थर मारकर मृत्युदंड जैसा कानून भी शामिल था।

कूफी उन महिलाओं में रही हैं, जो उस अफगान प्रतिनिधिमंडल में शामिल रही

हालांकि कूफी उन महिलाओं में रही हैं, जो उस अफगान प्रतिनिधिमंडल में शामिल रही हैं, जिसने देश में कट्टर इस्लामी पूर्व शासकों से कई दौर की बातचीत की। शांति लौटाने के लिए देश में ये बातचीत कई महीनों से चल रही है। पिछले साल इसी समय वो उन 70 लोगों में शामिल थीं, जो मास्को इसी बातचीत के सिलसिले में गई थीं। इसमें दो महिलाएं शामिल थीं।

होटल में तालिबान के साथ ही ठहरीं

फौजिया कूफी जिस होटल में ठहरी थी, उसी होटल के कमरों में तालिबान ठहरे थे। जब उन्होंने इस बातचीत में ये कहा देश किसी खास आइडोलॉजी से नहीं बंधा है। अब हर किसी के विचारों को जगह मिलनी चाहिए। तब टेबल पर सामने बैठे तालिबान प्रतिनिधि हमारी ओर देखने लगे। हालांकि तालिबान ने सरकार में आने से मना कर दिया। उसके बाद अमेरिका और रूस के दबाव में वह फिर बातचीत करने पर सहमत हुए। कूफी तीन बार इस बातचीत का हिस्सा रह चुकी हैं।

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तालिबान से बातचीत में महिलाओं की जमकर पैरवी की

वह बैठकों में अब तालिबान के सामने सीधे तौर पर महिलाओं के अधिकारों की पैरवी करती हैं। उन्होंने लगातार मांग भी की है कि शांति प्रक्रिया में और महिलाओं को शामिल किया जाना चाहिए। पहले तो तालिबान के सामने जब ये बातें की जाती थीं तो वह हंसते थे।

आखिरकार बातचीत के दौरान तालिबान वार्ताकार उनकी बात पर रिस्पांस देने लगे। उन्होंने कहा कि ठीक है महिला प्रधानमंत्री तो बन सकती है लेकिन राष्ट्रपति नहीं? उन्होंने ये भी कहा कि महिलाएं जज नहीं बन सकतीं।

बदला तालिबान का रुख

अब तालिबान की आधिकारिक स्थिति ये है कि महिलाएं पढ़ भी सकती हैं और काम भी कर सकती, लेकिन इस्लामिक कानूनों और अफगान संस्कृति के दायरे में। जब तालिबान ने अफगानिस्तान का राज अपने हाथों में लिया तब 1996 में काबुल में वो डॉक्टरी की पढ़ाई कर रही थीं। जब सारे काबुल शहर पर उन्होंने कब्जा कर लिया तब उन्होंने सारी मारकाट को अपने पांचवें मंजिल के फ्लैट से देखा। उनके मिलिटेंट्स आटोमेटिक राइफल्स से लैस थे।

तब तालिबान के चलते टूटा डॉक्टर बनने का सपना

कुछ ही दिनों में उनका डॉक्टर बनने का सपना टूट गया। उन्हें मेडिकल कॉलेज से बाहर निकाल दिया गया। हालांकि वह काबुल में रुकी रहीं और उन लड़कियों को इंग्लिश पढ़ाने लगीं, जिनके लिए स्कूलों के दरवाजे बंद किए जा चुके थे।

बुर्का नहीं खरीदा, क्योंकि वह इसे क्लचर का हिस्सा नहीं समझती थीं

उनका मानना था कि वह पांच साल उनके जीवन के सबसे दर्द भरे साल थे। हालांकि इस दौर में भी उन्होंने बुर्का नहीं खरीदा, क्योंकि वह इसे क्लचर का हिस्सा नहीं समझती थीं। उन्होंने अपना बाहर निकलना सीमित कर लिया।
जब तालिबान राज खत्म हुआ तो बहुत से लोगों ने राहत की सांस ली। तब महिलाओं ने सड़कों पर निकलना शुरू किया और खरीदारी शुरू की। तालिबान के ढहने के बाद कूफी संयुक्त राष्ट्र के लिए काम करने लगीं। उन्होंने सैनिक बनाए गए बच्चों का पुर्नवास शुरू किया।

वर्ष 2005 में चुनाव लड़ा और जीता

उनके पति को जेल में डाल दिया गया था। उसी दौरान पति की टीबी से जेल में ही मृत्यु हो गईं। वह अपनी दो बेटियों के साथ अकेली पड़ गईं। लेकिन इसके बाद भी जब संसदीय चुनाव 2005 में घोषित हुए तो उन्होंने चुनाव लड़ने का फैसला किया। उनके पिता सांसद थे। उनकी मदद से उन्हें काफी वोट मिले। वह संसद में पहुंचीं और सांसद के तौर पर अपने पहले दो कार्यकाल में वह पार्लियामेंट में डिप्टी स्पीकर बनीं। इसी दौरान तालिबान ने उनकी हत्या का प्रयास भी किया। उन पर गोलियां चलाईं गईं, लेकिन उन्हें और दोनों बेटियों को सुरक्षा अधिकारियों ने बचा लिया।

इस देश में जो भी शासन करेगा, उसे महिलाओं को साथ में लेकर चलना ही होगा

अब दस साल बाद धीरे धीरे अब तालिबान शांति समझौते पर सहमत हुए हैं। इस सप्ताह के आखिर में इस समझौते पर हस्ताक्षर हो सकते हैं, लेकिन बरसों से चल रही मारकाट में दस हजाार से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। देश को बहुत नुकसान हुआ है। लाखों लोग देश से पलायन कर चुके हैं। फौजिया की दोनों बेटियां अब काबुल यूनिवर्सिटी में पढ़ रही हैं और उनका मानना है कि इस देश में जो भी शासन करेगा, उसे महिलाओं को साथ में लेकर चलना ही होगा।

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