जालंधर। केंद्रीय रेल एवं खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू (Ravneet Bittu) ने अभिनेता और गायक दिलजीत दोसांझ की बहुचर्चित फिल्म ‘सतलुज’ (Sutlej) में दिखाए गए कुछ घटनाक्रमों पर तीखी आपत्ति जताई है। बुधवार को जालंधर कैंट रेलवे स्टेशन का औचक निरीक्षण करने पहुंचे केंद्रीय मंत्री ने मीडिया से बातचीत के दौरान फिल्म की कहानी और उसमें अपने दादा व पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय बेअंत सिंह के संभावित चित्रण पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने स्पष्ट किया कि मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की गिरफ्तारी से पहले ही उनके दादा शहीद हो चुके थे, इसलिए इस पूरे मामले में उनके दादा का नाम घसीटना पूरी तरह गलत और ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत है।
केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू (Ravneet Bittu) ने फिल्म को लेकर हो रही चर्चाओं पर तंज कसते हुए कहा कि कुछ लोग केवल उनके और उनके परिवार के खिलाफ बोलने के बहाने ढूंढते हैं, क्योंकि इससे उनकी राजनीतिक और व्यावसायिक ‘दुकानदारी’ चलती है। उन्होंने फिल्म को एक प्रकार का ‘प्रॉपेगैंडा’ (Propaganda) करार देते हुए कहा कि असल में किसी को भी फिल्म की मूल कहानी या जसवंत सिंह खालड़ा के संघर्ष से कोई वास्तविक लेना-देना नहीं है। आज की पीढ़ी दिलजीत दोसांझ के बड़े नाम और लोकप्रियता के कारण ही इस फिल्म की चर्चा कर रही है, क्योंकि इसमें दिलजीत का पैसा और कमाई लगी हुई है। बिट्टू ने आगे कहा कि दिलजीत दोसांझ ने इस फिल्म को पंजाबी और हिंदी भाषाओं को मिलाकर व्यावसायिक लाभ के लिए बनाया है, लेकिन उन्हें उस दौर के पंजाब के वास्तविक और जमीनी हालात की सही जानकारी नहीं है। उन्होंने गर्व से कहा कि वे अपने दादा शहीद बेअंत सिंह की अमन-शांति की महान परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं, इसलिए लोग उनके परिवार को निशाना बना रहे हैं।
फिल्म में दिखाए गए घटनाक्रमों को तकनीकी रूप से खारिज करने के लिए केंद्रीय मंत्री ने ऐतिहासिक तारीखों और तथ्यों का पूरा ब्योरा मीडिया के सामने रखा। बिट्टू ने स्पष्ट किया कि उनके दादा बेअंत सिंह फरवरी 1992 में पंजाब के मुख्यमंत्री बने थे और 31 अगस्त 1995 को वे आतंकी हमले में शहीद हो गए थे।
उन्होंने बताया कि बेअंत सिंह के मुख्यमंत्री रहते हुए जसवंत सिंह खालड़ा पर पुलिस का कोई केस नहीं था, न ही उन्हें कभी पुलिस ने हिरासत में लिया था। खालड़ा उस समय पूरी स्वतंत्रता के साथ लावारिस शवों का डेटा तैयार करने के लिए काम कर रहे थे और बिना किसी लुकआउट नोटिस के लगातार कनाडा व अमेरिका की यात्राएं कर रहे थे।
रवनीत सिंह बिट्टू ने समय-चक्र (Timeline) को रेखांकित करते हुए सबसे बड़ा सवाल उठाया कि जब उनके दादा 31 अगस्त 1995 को शहीद हो चुके थे, जबकि जसवंत सिंह खालड़ा को उसके बाद यानी 6 सितंबर 1995 को पुलिस द्वारा कथित तौर पर उठाया गया था; तो ऐसी स्थिति में उस समय उनके दादा पंजाब के मुख्यमंत्री थे ही नहीं। जब वे इस दुनिया में ही नहीं थे, तो फिल्म की कहानी में उनकी सरकार या उनके रोल को किस आधार पर शामिल किया जा रहा है? केंद्रीय मंत्री ने इस विरोधाभास को फिल्म निर्माताओं की बड़ी चूक और जानबूझकर की गई बदनामी का प्रयास बताया है। इस बयान के बाद अब पंजाब के राजनीतिक और सिनेमा जगत में इस फिल्म को लेकर विवाद और गहराने के आसार नजर आ रहे हैं।

