ए भोले किसान, मेरी दो बात मान लो – एक तो बोलना सीख लो और दुश्मन को पहचान लो

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नई दिल्ली। सरकारें आती हैं और चली जाती हैं करती है तो सिर्फ वादे,चुनावी दौर में जहाँ अभी भी कांग्रेस हो या बीजेपी अपने घोषणा पत्रों से लुभावने वादे तो कर रहे हैं लेकिन सरकार बनने पर उसे ये सब कितना याद रहता है ये बात ज़्यादा मायने रखता है.देश के किसान की हालत शायद जैसे सौ साल पहले थी वैसे ही आज भी है या शायद नाम मात्र का फर्क आया भी हो. जहाँ एक तरह देशभर के 35 हजार किसान संसद भवन के सामने धरना देने पहुंचे हैं। किसान कर्जमाफी, फसलों के दाम में वृद्धि की मांग कर रहे हैं। वहीं राजनैतिक दलों ने इस गर्म तवे पर रोटी सेकना भी शुरू कर दिया है। जहाँ केजरीवाल ने ये बयान दिया कि,सीमा पर जवान और देश में किसान मर रहे हैं. वही कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्होंने किसानो से जो वादा किया था उसे निभाया ही नहीं. किसान दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना दे रहे हैं, उन्होंने केंद्र सरकार पर अनदेखी का आरोप लगाया और खेती पर संकट को लेकर संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग की।

वही बीसवीं सदी के किसान नेता दीनबंधु चौधरी छोटू राम ने किसान को कहा था ए भोले किसान, मेरी दो बात मान लें- “एक बोलना सीख और एक दुश्मन को पहचान ले”

किसानों ने बोलना सीख लिया है जिसके चलते आज वो अपनी मांगों को लेकर अड़ा है,उसकी दो मांगे हैं जिसमे संसद का एक विशेष अधिवेशन हो, जिसमें किसानों के दो कानून बनाये जाएं। पहला कानून- किसानों को अपनी फसल का उचित दाम कानूनी गारंटी के साथ मिले। दूसरा कानून- किसानों को एक झटके में कर्ज से मुक्त किया जाये। ये विधेयक संसद के सामने पेश हो चुके हैं। इसलिए यह भरोसा बनता है कि इस बार किसान की आवाज सुनी जायेगी।

लेकिन दुश्मन की पहचान थोड़ी मुश्किल नज़र आती है क्योंकी किसान के सभी दुश्मन न सही पर दोस्त भी कम है। सभी पार्टियों ने इसे चुनावी मुद्दा जो बना लिया है।आज का किसान वो सत्तर साल पुराना किसान नहीं रहा. पहले वो अलग इलाकों अलग जातियों अलग वर्गों में बंट कर अपनी आवाज़ उठाता था इसलिए किसानों की आवाज कभी सुनी नहीं गयी।लेकिन आज जंतर मंतर पर अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के बैनर के नीचे पूरे देश के किसान चाहे किसी भी वर्ग,जाति या विचारधारा के हों सभी इकठ्ठा हो रहे हैं। इतना ही नहीं पहला मौका है जब किसानो के साथ आम नागरिक,डॉक्टर,छात्र और वकील भी जुड़े हैं.साथ ही ये भी पहली बार है जब किसान सिर्फ धरना प्रदर्शन ही नहीं बल्कि विकल्प भी दे रहा है।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि किसानों और युवाओं के लिए एक होना पड़ेगा। राहुल ने कहा, “देश का किसान आपके (मोदी के) दोस्त का अनिल अंबानी का विमान नहीं मांग रहा, वह सिर्फ अपना हक मांग रहा है। आज हिंदुस्तान के सामने दो बड़े मुद्दे हैं, पहला किसाने के भविष्य का मुद्दा और दूसरा युवाओं के रोजगार का। इनके भविष्य के लिए जनता को अगर मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री को बदलना पड़े तो बदल दो।”

वही दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने कहा- मैं दिल्ली का मुख्यमंत्री हूं। इस नाते आप लोगों का दिल्ली में स्वागत है। आप बार-बार दिल्ली आइए। मुझे दुख इस बात का है कि आप दिल्ली दुख की घड़ी में आए हैं, दुखी होकर आए हैं। सरकार से नाराज होकर आए हैं। भाजपा ने पिछले चुनाव के पहले किसानों से जितने वादे किए थे, उन सारे वादों से मुकर गई। स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू करने का वादा किया था, 100 रुपए लागत पर 50 रुपए मुुनाफा देंगे। अब सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया कि स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू नहीं कर सकते।

सरकार चाहे बीजेपी की हो या कांग्रेस की किसान का भला करने के लिए किसी ने नहीं सोचा। दिल्ली में इकठ्ठा हुए संगठनों का मानना है कि मोदी सरकार देश की सबसे बड़ी किसान विरोधी सरकार है। बीजेपी न सिर्फ़ किसानो के हितों का हनन कर रही है बल्कि अपने किये हुए वादों को भी पूरा कर पाने में भी असफल साबित हुई है.केंद्र सरकार तीनो तरफ से किसान विरोधी है चाहे वो उसकी सोच और दृष्टि को लेकर हो या किसान के वर्ग विरोध की.देश की मोदी सरकार व्यावहारिक, मानसिक और भावनात्मक तीनों स्तरों पर किसान विरोधी है। जिस विचारधारा के साथ मोदी सरकार आगे बढ़ रही है उससे किसान के हाँथ खाली,खेत उजाड़ और किसानो का शहर की और पयालन लगभग तय है।

केवल ये कहना सही नहीं होगा की मौजूदा सरकार ने ही किसानो के हितों का हनन किया है बल्कि सभी सरकारें किसानों का हक़ छीनती आई हैं,किसान विरोधी रही हैं। किसानों के प्रदर्शन और धरने को लेकर सरकार का क्या रवैया रहता है ये तो वक़्त ही बताएगा। लेकिन अगर किसानो की मांगों को सरकार मंज़ूर करती है तो चुनावी हवा और देश की राजनीती का रुख शायद बदल जाये।

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