Site icon

150 सीटों की मांग पर अड़ी कांग्रेस, जीत के फॉर्मूले पर अड़ी सपा

Rahul-Gandhi-Akhilesh-Yadav

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी (SP) और कांग्रेस (Congress) के बीच सीट बंटवारे को लेकर दबाव की राजनीति तेज होती दिखाई दे रही है। दोनों दल सार्वजनिक बयानों के जरिए अपनी-अपनी राजनीतिक ताकत का संदेश देने के साथ-साथ सीटों पर बेहतर सौदेबाजी की कोशिश में जुटे हैं। कांग्रेस गठबंधन में सम्मानजनक और बराबरी की हिस्सेदारी की मांग कर रही है, जबकि सपा का कहना है कि सीटों का बंटवारा केवल जीतने की क्षमता के आधार पर होना चाहिए।

विधानसभा चुनाव में अब करीब छह-सात महीने का समय शेष है। सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस इस बार 150 से अधिक सीटों पर दावा जता रही है। दूसरी ओर, सपा नेतृत्व सीटों की संख्या पर खुलकर कुछ नहीं कह रहा, लेकिन उसका स्पष्ट रुख है कि गठबंधन उन्हीं सीटों पर केंद्रित होना चाहिए जहां जीत की वास्तविक संभावना हो। कांग्रेस यह संदेश भी देने की कोशिश कर रही है कि उसके साथ गठबंधन होने पर विपक्षी वोटों का अधिकतम लाभ मिल सकता है। इसी रणनीति के तहत समय-समय पर बसपा के साथ संभावित तालमेल के संकेत भी दिए गए, हालांकि बसपा ने ऐसे संकेतों को कभी गंभीरता नहीं दी।

बयानों से बढ़ी सियासी तल्खी

हाल के दिनों में दोनों दलों के नेताओं के बयानों ने गठबंधन के भीतर खींचतान को और उजागर किया है। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कहा था कि 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा 120 सीटें भी नहीं जीत सकी थी, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन के बाद उसकी सीटें बढ़कर 37 हो गईं।

इस बयान पर सपा के राज्यसभा सांसद रामजी लाल सुमन ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कुछ लोग अनावश्यक बयान देकर गठबंधन की मर्यादा भूल रहे हैं। उनका कहना था कि यदि गठबंधन को मजबूत बनाए रखना है तो सार्वजनिक मंचों पर संयम और सौहार्द बनाए रखना जरूरी है। इमरान मसूद इससे पहले भी सपा पर मुस्लिम समुदाय से जुड़े मुद्दों को पर्याप्त मजबूती से न उठाने का आरोप लगाते रहे हैं।

कांग्रेस ने बराबरी की साझेदारी पर दिया जोर

कांग्रेस के उत्तर प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने स्पष्ट किया है कि पार्टी विधानसभा चुनाव सम्मान और बराबरी के आधार पर लड़ेगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस इस बार गठबंधन में “छोटे भाई” की भूमिका स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है और सीट बंटवारे में भी उसी अनुरूप हिस्सेदारी चाहती है।

उधर, सपा नेताओं का तर्क है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 107 सीटें दी गई थीं, लेकिन वह केवल सात सीटें जीत सकी थी। उनका यह भी कहना है कि जब कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ा था, तब उसे सिर्फ दो सीटों पर जीत मिली थी। ऐसे में भाजपा को चुनौती देने के लिए सीटों की संख्या नहीं, बल्कि जीतने की क्षमता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

फिलहाल दोनों दल गठबंधन बनाए रखने की बात तो कर रहे हैं, लेकिन सीटों को लेकर जारी बयानबाजी से यह साफ संकेत मिल रहे हैं कि अंतिम समझौते से पहले राजनीतिक दबाव बनाने की कवायद अभी और तेज हो सकती है।

Exit mobile version